Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 2 / 11 / 5

गुहा॑ हि॒तं गुह्यं॑ गू॒ळ्हम॒प्स्वपी॑वृतं मा॒यिनं॑ क्षि॒यन्त॑म्। उ॒तो अ॒पो द्यां त॑स्त॒भ्वांस॒मह॒न्नहिं॑ शूर वी॒र्ये॑ण॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 11 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : इन्द्र: | छन्द : स्वराड्बृहती | स्वर : मध्यमः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : गुहा॑। हि॒तम्। गुह्य॑म्। गू॒ळ्हम्। अ॒प्सु। अपि॑ऽवृतम्। मा॒यिन॑म्। क्षि॒यन्त॑म्। उ॒तो इति॑। अ॒पः। द्याम्। त॒स्त॒भ्वांस॑म्। अह॑न्। अहि॑म्। शू॒र॒। वी॒र्ये॑ण॥

पदार्थ : हे (शूर) निर्भय राजन् ! जैसे (अप्सु) जलों में (अपीवृतम्) ढपे हुए (गूढम्) गुप्त पदार्थ को (अपः) और जलों को (उतो) तथा (द्याम्) प्रकाश को (तस्तभ्वांसम्) रोके हुए (अहिम्) मेघ को सूर्यमण्डल (अहन्) हनता है वैसे (वीर्येण) पराक्रम से (गुहा) गुप्तस्थान में (हितम्) धरे अर्थात् हित (गुह्यम्) गुप्त करने योग्य (क्षियन्तम्) निरन्तर वसते हुए (मायिनम्) मायावी शत्रुजन को मारो ॥५॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य अन्तरिक्षस्थ जलों में सोते हुए मेघ को हन के सब प्रजा को पुष्ट करता है। वैसे राजा कपट के बीच वर्त्तमान अधर्मी शत्रुजन को छिन्न-भिन्न कर प्रजा को सुखी करे ॥५॥