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Rigveda / 2 / 11 / 11

पिबा॑पि॒बेदि॑न्द्र शूर॒ सोमं॒ मन्द॑न्तु त्वा म॒न्दिनः॑ सु॒तासः॑। पृ॒णन्त॑स्ते कु॒क्षी व॑र्धयन्त्वि॒त्था सु॒तः पौ॒र इन्द्र॑माव॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 11 | Mantra No : 11

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : अब वैद्य विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : पिब॑ऽपिब। इत्। इ॒न्द्र॒। शू॒र॒। सोम॑म्। मन्द॑न्तु। त्वा। म॒न्दिनः॑। सु॒तासः॑। पृ॒णन्तः॑। ते॒। कु॒क्षी इति॑। व॒र्ध॒य॒न्तु॒। इ॒त्था। सु॒तः। पौ॒रः। इन्द्र॑म्। आ॒व॒॥

पदार्थ : हे (शूर) रोगों को नष्ट करनेवाले (इन्द्र) आयुर्वेद विद्यायुक्त वैद्य ! जो (मन्दिनः) प्रशंसा करने योग्य (सुतासः) ओषधियों के निकाले हुए रस (सोमम्) सोमलतादि ओषधियों के सार को पीनेवाले (त्वा) आपको (पृणन्तः) सुखी करते हुए (ते) आपकी (कुक्षी) कोखों की (वर्द्धयन्तु) वृद्धि करें और आपको (मदन्तु) हर्षित करावें उनको आप (इत्) ही (पिबापिब) पिओ पिओ (इत्था) इस हेतु से (सुतः) प्रसिद्धः (पौरः) पुर में उत्पन्न हुए आप (इन्द्रम्) ऐश्वर्य की (आव) रक्षा करो ॥११॥

भावार्थ : मनुष्य लोग यदि पुष्टि और बुद्धि देनेवाले रोगविनाशक ओषधियों के सार को सेवन करते हैं तो पुरुषार्थी होकर ऐश्वर्य को बढ़ा सकते हैं ॥११॥