Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 2 / 11 / 16

बृ॒हन्त॒ इन्नु ये ते॑ तरुत्रो॒क्थेभि॑र्वा सु॒म्नमा॒विवा॑सान्। स्तृ॒णा॒नासो॑ ब॒र्हिः प॒स्त्या॑व॒त्त्वोता॒ इदि॑न्द्र॒ वाज॑मग्मन्॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 11 | Mantra No : 16

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : इन्द्र: | छन्द : भुरिग्बृहती | स्वर : मध्यमः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : बृ॒हन्तः॑। इत्। नु। ये। ते॒। त॒रु॒त्र॒। उ॒क्थेभिः॑। वा॒। सु॒म्नम्। आ॒ऽविवा॑सान्। स्तृ॒णा॒नासः॑। ब॒र्हिः। प॒स्त्य॑ऽवत्। त्वाऽऊ॑ताः। इत्। इ॒न्द्र॒। वाज॑म्। अ॒ग्म॒न्॥

पदार्थ : हे (तरुत्र) दुःख से तारनेवाले (इन्द्र) अविद्याविनाशक ! (ते) आपके (उक्थेभिः) सुन्दर उपदेशों से (बृहन्तः) पूज्य प्रशंसनीय (इत्) ही (सुम्नम्) सुख को (आ,विवासान्) सब ओर से सेवते हैं वे (पस्त्यावत्) घर के तुल्य (बर्हिः) बढ़े हुए को (स्तृणानासः) ढाँपते हुए (वा) अथवा (त्वोताः) आपके रक्षा किये हुए (इत्) ही (वाजम्) विज्ञान को (नु) शीघ्र (अग्मन्) प्राप्त होते हैं ॥१६॥

भावार्थ : वे ही सुख को प्राप्त होते हैं, जो धार्मिक विद्वान् सत्पुरुषों से सुन्दर शिक्षित और रक्षित हों ॥१६॥