Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 2 / 12 / 6

यो र॒ध्रस्य॑ चोदि॒ता यः कृ॒शस्य॒ यो ब्र॒ह्मणो॒ नाध॑मानस्य की॒रेः। युक्तग्रा॑व्णो॒ यो॑ऽवि॒ता सु॑शि॒प्रः सु॒तसो॑मस्य॒ स ज॑नास॒ इन्द्रः॑॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 12 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : यः। र॒ध्रस्य॑। चो॒दि॒ता। यः। कृ॒शस्य॑। यः। ब्र॒ह्मणः॑। नाध॑मानस्य। की॒रेः। यु॒क्तऽग्रा॑व्णः। यः। अ॒वि॒ता। सु॒ऽशि॒प्रः। सु॒तऽसो॑मस्य। सः। ज॒ना॒सः॒। इन्द्रः॑॥

पदार्थ : हे (जनासः) मनुष्यो ! (यः) जो (रध्रस्य) हिंसा करनेवाले का (यः) को (कृशस्य) दुर्बल का (यः) जो (नाधमानस्य) समस्त ऐश्वर्य प्राप्त करानेवाले का (यः) जो (ब्रह्मणः) वेद का (युक्तग्राव्णः) और जिसमें मेघ वा पत्थरयुक्त हैं उस पदार्थ का (कीरे:) तथा सकल विद्याओं की स्तुति प्रशंसा करनेहारे का (चोदिता) प्रेरणा करनेवाला वा (यः) जो (सुशिप्रः) ऐसा है कि जिसमें सुन्दर सेवन होते और (सुतसोमस्य) जिसने उत्पन्न किये सोमादि अच्छे पदार्थ उसकी (अविता) रक्षा करनेवाला है (सः) वह (इन्द्रः) परमैश्वर्यवान् परमेश्वर है ॥६॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! उसी परमेश्वर की उपासना तुम करो कि जो जगत् की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलयकर्त्ता तथा सकल विद्यायुक्त वेद का उत्तम ज्ञान करानेवाला है ॥६॥