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Rigveda / 2 / 13 / 2

स॒ध्रीमा य॑न्ति॒ परि॒ बिभ्र॑तीः॒ पयो॑ वि॒श्वप्स्न्या॑य॒ प्र भ॑रन्त॒ भोज॑नम्। स॒मा॒नो अध्वा॑ प्र॒वता॑मनु॒ष्यदे॒ यस्ताकृ॑णोः प्रथ॒मं सास्यु॒क्थ्यः॑॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 13 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : इन्द्र: | छन्द : भुरिक्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर ईश्वर के विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : स॒ध्री। ई॒म्। आ। य॒न्ति॒। परि॑। बिभ्र॑तीः। पयः॑। वि॒श्वऽप्स्न्या॑य। प्र। भ॒र॒न्त॒। भोज॑नम्। स॒मा॒नः। अध्वा॑। प्र॒ऽवता॑म्। अ॒नु॒ऽस्यदे॑। यः। ता। अकृ॑णोः। प्र॒थ॒मम्। सः। अ॒सि॒। उ॒क्थ्यः॑॥

पदार्थ : जो (सध्री) समान ठहरनेवाले (पयः) रस को (बिभ्रतीः) धारण किये हुए जल (अनुष्यदे) अनुकूलता से किञ्चित्-किञ्चित् झरने के लिये (विश्वप्स्न्याय) संसार की पालना के लिये (ईम्) सब ओर से (परि,आ,यन्ति) पर्याय से प्राप्त होते हैं (भोजनम्) पालना को (प्र, भरन्त) धारण करते जिन (प्रवताम्) जाते हुए जलों का (समानः) समान (अध्वा) मार्ग है (यः) जो (ता) उनको (प्रथमम्) उत्तम नियमवान् (अकृणोः) करते हैं (सः) वह आप (उक्थ्यः) प्रशंसा करने योग्य (असि) हैं ॥२॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! जो जल पवन के साथ चलता है, जिससे सबका पालन होता है, उसको सदा शोधो, जिससे आप लोग प्रशंसित हों ॥२॥