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Rigveda / 2 / 15 / 10

नू॒नं सा ते॒ प्रति॒ वरं॑ जरि॒त्रे दु॑ही॒यदि॑न्द्र॒ दक्षि॑णा म॒घोनी॑। शिक्षा॑ स्तो॒तृभ्यो॒ माति॑ ध॒ग्भगो॑ नो बृ॒हद्व॑देम वि॒दथे॑ सु॒वीराः॑॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 15 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : इन्द्र: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब दान देने के कर्म का विषय अगले मन्त्र में किया है।

पदपाठ : नू॒नम्। सा। ते॒। प्रति॑। वर॑म्। जरि॒त्रे। दु॒ही॒यत्। इ॒न्द्र॒। दक्षि॑णा। म॒घोनी॑। शिक्ष॑। स्तो॒तृऽभ्यः॑। मा। अति॑। ध॒क्। भगः॑। नः॒। बृ॒हत्। व॒दे॒म॒। वि॒दथे॑। सु॒ऽवीराः॑॥

पदार्थ : हे (इन्द्र) दान करनेवाले जन ! (ते) तेरी (मघोनी) प्रशंसित धनयुक्त (दक्षिणा) दक्षिणा और (स्तोतृभ्यः) धार्मिक विद्वानों के लिये (शिक्षा) विद्याग्रहण की सिद्धि करानेवाली शिक्षा (जरित्रे) समस्त विद्याओं की प्रशंसा करनेवाले जन के लिये (प्रतिवरम्) श्रेष्ठ कार्य के प्रति श्रेष्ठ कार्य को (दुहीयत्) पूर्ण करे (सा) वह (नः) हमारा जो (भगः) ऐश्वर्य उसको (मातिधक्) मत नष्ट करे जिससे (सुवीराः) सुन्दर वीरों से युक्त हम लोग (विदथे) यज्ञ में (बृहत्) बहुत (नूनम्) निश्चित (वदेम) कहें ॥१०॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! तुमको उत्तम विद्वानों के लिये अभीष्ट दक्षिणा और विद्यार्थियों के लिये शिक्षा देनी चाहिये, जिससे देने और लेनेवाले फलयुक्त हों ॥१०॥ इस सूक्त में विद्वान्, सूर्य, परमेश्वर, राज्य और दातृकर्म का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ॥ यह पन्द्रहवाँ सूक्त और सोलहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥