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Rigveda / 2 / 16 / 2

यस्मा॒दिन्द्रा॑द्बृह॒तः किं च॒नेमृ॒ते विश्वा॑न्यस्मि॒न्त्संभृ॒ताधि॑ वी॒र्या॑। ज॒ठरे॒ सोमं॑ त॒न्वी॒३॒॑ सहो॒ महो॒ हस्ते॒ वज्रं॒ भर॑ति शी॒र्षणि॒ क्रतु॑म्॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 16 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : इन्द्र: | छन्द : भुरिक्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विद्युत् के विषय को इस मन्त्र में कहा गया है।

पदपाठ : यस्मा॑त्। इन्द्रा॑त्। बृ॒ह॒तः। किम्। च॒न। ई॒म्। ऋ॒ते। विश्वा॑नि। अ॒स्मि॒न्। सम्ऽभृ॑ता। अधि॑। वी॒र्या॑। ज॒ठरे॑। सोम॑म्। त॒न्वि॑। सहः॑। महः॑। हस्ते॑। वज्र॑म्। भर॑ति। शी॒र्षणि॑। क्रतु॑म्॥

पदार्थ : हे मनुष्यो (यस्मात्) जिस (बृहतः) बड़े (इन्द्रात्) विद्युत् अग्नि से (ते) बिना (किञ्चन) कुछ भी नहीं है (अस्मिन्) इसके (जठरे) उदर में (विश्वानि) समस्त वे पदार्थ (वीर्य्या) जो वीर शत्रुओं को फेंकनेवाले विद्वानों में उपयोगी हैं (सम्भृता) अच्छे प्रकार धरे हुए हैं जो (तन्वि, ईम्) अपने शरीर में सब ओर से (सोमम्) ओषधि अन्न को (सहः) और बल को तथा (हस्ते) हाथ में (महः) बड़े (वज्रम्) शस्त्र को (शीर्षणि) और शिर के बीच (क्रतुम्) उत्तम बुद्धि को (अभि भरति) अधिकता से धारण करता है, वह विद्युत् अग्नि सबको यथावत् अच्छे प्रकार काम में लाने योग्य है ॥२॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! जितना स्थूल वस्तु मात्र संसार में है, उतना समस्त बिजली के बिना नहीं है, उसको प्रयत्न से तुम लोग जानो ॥२॥