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Rigveda / 2 / 23 / 12

अदे॑वेन॒ मन॑सा॒ यो रि॑ष॒ण्यति॑ शा॒सामु॒ग्रो मन्य॑मानो॒ जिघां॑सति। बृह॑स्पते॒ मा प्रण॒क्तस्य॑ नो व॒धो नि क॑र्म म॒न्युं दु॒रेव॑स्य॒ शर्ध॑तः॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 23 | Mantra No : 12

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : बृहस्पतिः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय : अब अगले मन्त्र में राज विषय को कहा है।

पदपाठ : अदे॑वेन। मन॑सा। यः। रि॒ष॒ण्यति॑। शा॒साम्। उ॒ग्रः। मन्य॑मानः। जिघां॑सति। बृह॑स्पते। मा। प्रण॑क्। तस्य॑। नः॒। व॒धः। नि। क॒र्म॒। म॒न्युम्। दुः॒ऽएव॑स्य। शर्ध॑तः॥

पदार्थ : हे (बृहस्पते) बड़े राज्य के पालनेवाले (यः) जो (शासाम्) शासना करनेवालियों का (उग्रः) भयङ्कर (मन्यमानः) अभिमानी (अदेवेन) अशुद्ध (मनसा) मनसे (रिषण्यति) हिंसा करने को अपने से चाहता है वा (जिघांसति) साधारण मारने की इच्छा करता है (तस्य) उसके (मन्युम्) क्रोध को (शर्द्धत) बलवत्ता से सहते हुए (दुरेवस्य) दुःख से प्राप्त होने योग्य का (वधः) नाश (मा,प्रणक्) मत नष्ट हो (नः) हमारा (कर्म) कर्म (नि) मत निरन्तर नष्ट हो ॥१२॥

भावार्थ : जो राज्यशासन करते हैं, वे निर्बुद्धि हिंसकों को वश करें, यदि वश में न आवें, तो इनको बलात्कारपूर्वक मारें, जिससे न्याय का नाश न हो ॥१२॥