Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 2 / 23 / 15

बृह॑स्पते॒ अति॒ यद॒र्यो अर्हा॑द्द्यु॒मद्वि॒भाति॒ क्रतु॑म॒ज्जने॑षु। यद्दी॒दय॒च्छव॑स ऋतप्रजात॒ तद॒स्मासु॒ द्रवि॑णं धेहि चि॒त्रम्॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 23 | Mantra No : 15

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : बृहस्पतिः | छन्द : भुरिक्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब विद्वान् विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : बृह॑स्पते। अति॑। यत्। अ॒र्यः। अर्हा॑त्। द्यु॒ऽमत्। वि॒ऽभाति॑। क्रतु॑ऽमत्। जने॑षु। यत्। दी॒दय॑त्। शव॑सा। ऋ॒त॒ऽप्र॒जा॒त॒। तत्। अ॒स्मासु॑। द्रवि॑णम्। धे॒हि॒। चि॒त्रम्॥

पदार्थ : हे (तप्रजात) सत्याचरण में प्रकट (बृहस्पते) बड़ों के पालनेवाले विद्वान् (यत्) जो (अर्यः) ईश्वर (जनेषु) मनुष्यों में (अर्हात्) योग्य व्यवहार से (द्युमत्) प्रकाशवान् (क्रतुमत्) प्रशंसित प्रज्ञायुक्त वा (शवसा) बल से (यत्) जो (दीदयत्) प्रकाशकर्त्ता (अति,विभाति) अतीव प्रकाशित होता है (तत्) उस (चित्रम्) अद्भुत (द्रविणम्) धन को (अस्मासु) हम लोगों में (धेहि) स्थापन कीजिये ॥१५॥

भावार्थ : मनुष्यों को चाहिये कि जो-जो ईश्वर ने वेदद्वारा सत्य का प्रकाश किया, वह-वह सब प्रकाश करें और जो-जो स्वार्थ चाहें, वह-वह सबके लिये चाहें ॥१५॥