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Rigveda / 2 / 25 / 2

वी॒रेभि॑र्वी॒रान्व॑नवद्वनुष्य॒तो गोभी॑ र॒यिं प॑प्रथ॒द्बोध॑ति॒ त्मना॑। तो॒कं च॒ तस्य॒ तन॑यं च वर्धते॒ यंयं॒ युजं॑ कृणु॒ते ब्रह्म॑ण॒स्पतिः॑॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 25 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : ब्रह्मणस्पतिः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय : कौन मनुष्य विद्या वृद्धि कर सकता है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : वी॒रेभिः॑। वी॒रान्। व॒न॒व॒त्। व॒नु॒ष्य॒तः। गोभिः॑। र॒यिम्। प॒प्र॒थ॒त्। बोध॑ति। त्मना॑। तो॒कम्। च॒। तस्य॑। तन॑यम्। च॒। व॒र्ध॒ते॒। यम्ऽय॑म्। युज॑म्। कृ॒णु॒ते। ब्रह्म॑णः। पतिः॑॥

पदार्थ : जो (ब्रह्मणः,पतिः) अन्न का रक्षक विद्वान् जन (वनुष्यतः) याचक मनुष्य के (वीरेभिः) वीर पुरुषों के साथ (वीरान्) शरीरात्म बलयुक्त को और (गोभिः) इन्द्रियों से (वनवत्) वन जङ्गल से जैसे वैसे (रयिम्) शोभा को (पप्रथत्) प्रख्यात प्रसिद्ध करता है (त्मना) अन्तःकरण से पदार्थ विज्ञान को (बोधति) जानता है (तस्य) उसका (तोकम्) छोटा बालक (च) और ऐश्वर्य (च) तथा (तनयम्) पौत्र आदि (वर्द्धते) वृद्धि को प्राप्त होता वह (यंयम्) जिस-जिसको (युजम्) शुभ गुणयुक्त (कृणुते) करता है वह-वह अपने स्वरूप से प्रख्यात होता है ॥२॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे धन की याचना करता हुआ पुरुष मन को युक्त करता वैसे पुत्रादि के पालन में चित्त देता है, जिस पदार्थ के साथ जिसके योग की योग्यता होती, उसको उसके साथ प्रतिदिन युक्त करता है, वह बहुत उत्तम मनुष्यों को प्राप्त होके विद्या की वृद्धि कर सकता है ॥२॥