Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 2 / 28 / 2

तव॑ व्र॒ते सु॒भगा॑सः स्याम स्वा॒ध्यो॑ वरुण तुष्टु॒वांसः॑। उ॒पाय॑न उ॒षसां॒ गोम॑तीनाम॒ग्नयो॒ न जर॑माणा॒ अनु॒ द्यून्॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 28 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : कूर्मो गार्त्समदो गृत्समदो वा | देवता : वरुणः | छन्द : भुरिक्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : तव॑। व्र॒ते। सु॒ऽभगा॑सः। स्या॒म॒। सु॒ऽआ॒ध्यः॑। व॒रु॒ण॒। तु॒स्तु॒ऽवांसः॑। उ॒प॒ऽअय॑ने। उ॒षसा॑म्। गोऽम॑तीनाम्। अ॒ग्नयः॑। न। जर॑माणाः। अनु॑। द्यून्॥

पदार्थ : हे (वरुण) श्रेष्ठ सज्जन विद्वान् पुरुष (तव) आपके (व्रते) सुशीलता रूप नियम में (स्वाध्यः) सुन्दर विज्ञानवाले (तुष्टुवांसः) स्तुतिकर्त्ता (गोमतीनाम्) प्रशस्त गौओंवाली (उषसाम्) प्रातःकाल की वेलाओं के (उपायने) समीप प्राप्त होने में (अग्नयः) अग्नियों के (न) तुल्य तेजस्वी (जरमाणाः) स्तुति करते हुए हम लोग (अनु, द्यून्) अनुकूल विद्या प्रकाशों को प्राप्त होके (सुभगासः) सुन्दर ऐश्वर्यवाले (स्याम) होवें ॥२॥

भावार्थ : विद्यार्थी और उपदेश सुननेवाले मनुष्यों को चाहिये कि सदा विद्वानों का सङ्ग और सेवा करके प्रतिदिन विद्या का ग्रहण करें, जैसे प्रातःकाल के समय में सब पदार्थ सुशोभित होते हैं, वैसे वे भी होवें ॥२॥