Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 2 / 28 / 5

वि मच्छ्र॑थाय रश॒नामि॒वाग॑ ऋ॒ध्याम॑ ते वरुण॒ खामृ॒तस्य॑। मा तन्तु॑श्छेदि॒ वय॑तो॒ धियं॑ मे॒ मा मात्रा॑ शार्य॒पसः॑ पु॒र ऋ॒तोः॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 28 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : कूर्मो गार्त्समदो गृत्समदो वा | देवता : वरुणः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर विद्यार्थी लोग कैसे हों, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : वि। मत्। श्र॒थ॒य॒। र॒श॒नाम्ऽइ॑व। आगः॑। ऋ॒ध्याम॑। ते॒। व॒रु॒ण॒। खाम्। ऋ॒तस्य॑। मा। तन्तुः॑। छे॒दि॒। वय॑तः। धिय॑म्। मे॒। मा। मात्रा॑। शा॒रि॒। अ॒पसः॑। पु॒रा। ऋ॒तोः॥

पदार्थ : हे (वरुण) श्रेष्ठ पुरुष आप (रशनामिव) रस्सी के तुल्य (मत्,आगः) मुझसे अपराध को (वि,श्रथय) विशेष कर नष्ट कीजिये जिससे (ते) आपके समीप हमलोग (ध्याम) उन्नत हों जैसे (तस्य) जल की (खाम्) नदी को नहीं नष्ट करते वैसे आपसे (तन्तुः) मूल (मा) न (छेदि) नष्ट किया जाये (वयतः) प्राप्त होते हुए (मे) मेरी (धियम्) बुद्धि को नष्ट न कीजिये (तोः) तु समय से (पुरा) पहले (अपसः) कर्म से मत (शारि) नष्ट कीजिये और (मात्रा) माता के साथ विरोध (मा) मत कर ॥५॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे रस्सी से बंधे हुए घोड़े नियम से चलते हैं, वैसे ही माता-पिता और आचार्य के नियम में बंधे हुए बालक विद्यार्थी विद्या और सुशिक्षा को ग्रहण करें, कभी मादक द्रव्य के सेवन से बुद्धि को नष्ट न करें, विवाह करके सदैव तुगामी हों और सन्तानों के प्रवाह को न तोड़ें ॥५॥