Rigveda / 2 / 29 / 2
यू॒यं दे॑वाः॒ प्रम॑तिर्यू॒यमोजो॑ यू॒यं द्वेषां॑सि सनु॒तर्यु॑योत। अ॒भि॒क्ष॒त्तारो॑ अ॒भि च॒ क्षम॑ध्वम॒द्या च॑ नो मृ॒ळय॑ताप॒रं च॑॥
Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 29 | Mantra No : 2
In English:
Seer : kuurmo gaartsamado gRRitsamado vaa | Devta : vishvedevaa: | Metre : triShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation Under Process
Verse : yuuya.m devaaH pramatiryuuyamojo yuuya.m dveShaa.msi sanutaryuyota. abhikShattaaro abhi cha kShamadhvamadyaa cha no mRRiLayataapara.m cha.
Component Words : yuuyam. devaaH. pra.amatiH. yuuyam. ojaH. yuuyam. dveShaa.msi. sanutaH. yuyota. abhi.akShattaaraH. abhi. cha. kShamadhvam. adya. cha. naH. mRRiLayata. aparam. cha.
In Hindi:
ऋषि : कूर्मो गार्त्समदो गृत्समदो वा | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।
पदपाठ : यू॒यम्। दे॒वाः॒। प्रऽम॑तिः। यू॒यम्। ओजः॑। यू॒यम्। द्वेषां॑सि। स॒नु॒तः। यु॒यो॒त॒। अ॒भि॒ऽक्ष॒त्तारः॑। अ॒भि। च॒। क्षम॑ध्वम्। अ॒द्य। च॒। नः॒। मृ॒ळय॑त। अ॒प॒रम्। च॒॥
पदार्थ : हे (देवाः) विद्वानो ! (यूयम्) तुम जो (प्रमतिः) उत्तम बुद्धि है उसको (च) और (यूयम्) तुम (ओजः) पराक्रम को (सनुतः) निरन्तर (युयोत) ग्रहण करो। (यूयम्) तुम (द्वेषांसि) द्वेषयुक्त कर्मों को निरन्तर पृथक् करो (अद्य) इस समय (नः) हमको (अपरम्) (च) और जीवसमूह को (मृळयत) सुखी करो। (अभिक्षत्तारः) सम्मुख योग करनेवाले तुम लोग हमारे अपराध को (अभि,क्षमध्वम्) सब प्रकार क्षमा करो ॥२॥
भावार्थ : जो विद्वान् लोग द्वेष को छोड़ के निरन्तर बुद्धि की उन्नति करते, दूसरे के अपराधों को क्षमा करते और सबको सुखी करते हैं, वे इस जगत् में सत्कार के योग्य होते हैं ॥२॥
In Sanskrit:
ऋषि : कूर्मो गार्त्समदो गृत्समदो वा | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : पुनस्तमेव विषयमाह।
पदपाठ : यू॒यम्। दे॒वाः॒। प्रऽम॑तिः। यू॒यम्। ओजः॑। यू॒यम्। द्वेषां॑सि। स॒नु॒तः। यु॒यो॒त॒। अ॒भि॒ऽक्ष॒त्तारः॑। अ॒भि। च॒। क्षम॑ध्वम्। अ॒द्य। च॒। नः॒। मृ॒ळय॑त। अ॒प॒रम्। च॒॥
पदार्थ : (यूयम्) (देवाः) (प्रमतिः) प्रकृष्टा प्रज्ञा (यूयम्) (ओजः) पराक्रमम् (यूयम्) (द्वेषांसि) द्वेषयुक्तानि कर्माणि (सनुतः) नैरन्तर्ये (युयोत) गृह्णीत वा पृथक्कुरुत (अभिक्षत्तारः) आभिमुख्ये योगस्य कर्त्तारः (अभि) (च) (क्षमध्वम्) (अद्य) इदानीम्। अत्र निपातस्य चेति दीर्घः (च) (नः) अस्मान् (मृळयत) सुखयत (अपरम्) जीवसमूहम् (च) ॥२॥
अन्वय : हे देवा यूयं या प्रमतिस्तां यूयमोजश्च सनुतर्युयोत यूयं द्वेषांसि सनुतर्युयोताऽद्य नोऽपरञ्च मृळयताऽभिक्षत्तारो यूयं नोऽपराधं चाभिक्षमध्वम् ॥२॥
भावार्थ : ये विद्वांसो द्वेषं विहाय सततं बुद्धिमुन्नयन्त्यन्येषामपराधं क्षमन्ते सर्वान् सुखयन्ति च तेऽत्र सत्कर्त्तव्या भवन्ति ॥२॥