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Rigveda / 2 / 29 / 4

ह॒ये दे॑वा यू॒यमिदा॒पयः॑ स्थ॒ ते मृ॑ळत॒ नाध॑मानाय॒ मह्य॑म्। मा वो॒ रथो॑ मध्यम॒वाळृ॒ते भू॒न्मा यु॒ष्माव॑त्स्वा॒पिषु॑ श्रमिष्म॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 29 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : कूर्मो गार्त्समदो गृत्समदो वा | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : ह॒ये। दे॒वाः॒। यू॒यम्। इत्। आ॒पयः॑। स्थ॒। ते। मृ॒ळ॒त॒। नाध॑मानाय। मह्य॑म्। मा। वः॒। रथः॑। म॒ध्य॒म॒ऽवाट्। ऋ॒ते। भू॒त्। मा। यु॒ष्माव॑त्ऽसु। आ॒पिषु॑। श्र॒मि॒ष्म॒॥

पदार्थ : (हये) हे (देवाः) विद्वानो जो (यूयम्) तुम लोग (इत्) ही (आपयः) सकलशुभगुणव्यापि (स्थ) होओ (ते) वे (नाधमानाय) माँगते हुए (मह्यम्) मेरे लिये (मृळत) सुखी करो जो (वः) तुम्हारा (मध्यमवाट्) पृथिवी के पदार्थों को इधर-उधर पहुँचानेवाला (रथः) विमान आदि यान (ते) जलरूप समुद्रादि में चलाता है, वह नष्ट (मा,भूत्) न हो। ऐसे (युष्मावत्सु) तुम्हारे सदृश (आपिषु) विद्यादि गुणों से व्याप्त सज्जनों में विद्या प्राप्ति के अर्थ हम लोग (श्रमिष्म) परिश्रम करें । यह हमारा श्रम नष्ट (मा) न होवे ॥४॥

भावार्थ : सब मनुष्यों को योग्य है कि विद्याओं को प्राप्त होके सबको सुखी करें और जैसे दृढ़ पुष्ट यान बनें, वैसा प्रयत्न करें, सदा विद्वानों में प्रीति रखके विद्या की उन्नति किया करें ॥४॥