Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 2 / 30 / 6

प्र हि क्रतुं॑ बृ॒हथो॒ यं व॑नु॒थो र॒ध्रस्य॑ स्थो॒ यज॑मानस्य चो॒दौ। इन्द्रा॑सोमा यु॒वम॒स्माँ अ॑विष्टम॒स्मिन्भ॒यस्थे॑ कृणुतमु लो॒कम्॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 30 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : इन्द्रासोमौ | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : प्र। हि। क्रतु॑म्। बृ॒हथः॑। यम्। व॒नु॒थः। र॒ध्रस्य॑। स्थः॒। यज॑मानस्य। चो॒दौ। इन्द्रा॑सोमा। यु॒वम्। अ॒स्मान्। अ॒वि॒ष्ट॒म्। अ॒स्मिन्। भ॒यऽस्थे॑। कृ॒णु॒त॒म्। ऊँ॒ इति॑। लो॒कम्॥

पदार्थ : हे (इन्द्रासोमा) सेनापति और ऐश्वर्य्यवान् महाशयो! (युवम्) जो तुम दोनों (रध्रस्य) सम्यक् सिद्ध करते हुए (यजमानस्य) सुखदाता यजमान के (हि) ही (चोदौ) प्रेरक (यम्) जिसको (प्र,बृहथः) बढ़ाओ और जिस (क्रतुम्) बुद्धि को (वनुथः) माँगो चाहो वे तुम दोनों सुखी (स्थः) होओ (अस्मिन्) इस (भयस्थे) भय में स्थित (अस्मान्) हमको (अविष्टम्) व्याप्त होओ (उ) और (लोकम्) देखने योग्य स्थान वा देश को (कृणुतम्) करो ॥६॥

भावार्थ : राजपुरुष बहुत बल और धनाढ्य लोग यथेष्ट ऐश्वर्य्य को पाकर किसी को भय न देवें किन्तु सदैव दरिद्री और निर्बलों को सुख में स्थापन करें, निवास करावें ॥६॥