Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 2 / 31 / 7

ए॒ता वो॑ व॒श्म्युद्य॑ता यजत्रा॒ अत॑क्षन्ना॒यवो॒ नव्य॑से॒ सम्। श्र॒व॒स्यवो॒ वाजं॑ चका॒नाः सप्ति॒र्न रथ्यो॒ अह॑ धी॒तिम॑श्याः॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 31 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : पङ्क्तिः | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : ए॒ता। वः॒। व॒श्मि॒। उ॒त्ऽय॑ता। य॒ज॒त्राः॒। अत॑क्षन्। आ॒यवः॑। नव्य॑से। सम्। श्र॒व॒स्यवः॑। वाज॑म्। च॒का॒नाः। सप्तिः॑। न। रथ्यः॑। अह॑। धी॒तिम्। अ॒श्याः॒॥

पदार्थ : जैसे (वाजम्) विज्ञान को (चकानाः) चाहते हुए (श्रवस्यवः) अपने को अन्न वा शास्त्र सुनने की इच्छा करते हुए (यजत्राः) मेल-मिलाप रखते हुए (आयवः) मनुष्य (नव्यसे) अति नवीन जन के लिये (रथ्यः) रथ के चलानेवाले (सप्तिः) घोड़े के (न) तुल्य विचारणीय विषय को (सम्,अतक्षन्) सम्यक् सूक्ष्म करते हैं अर्थात् अच्छे प्रकार ग्रहण किये वचनों को मैं (वश्मि) चाहता हूँ, हे विद्वन् ! जैसे आप (अह) नियमपूर्वक (धीतिम्) धैर्य को (अश्याः) प्राप्त होओ वैसे मैं भी धैर्य को प्राप्त होऊँ ॥७॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। मनुष्यों को चाहिये कि जिस-जिस पदार्थ की कामना विद्वान् लोग करें, उस-उसकी कामना करें। जैसे विद्वान् लोग उपदेश करें, वैसे उसको सुन निश्चय कर स्वीकार और अनुष्ठान किया करें ॥७॥ इस मन्त्र में विद्वान् और विदुषी स्त्रियों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त में कहे अर्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति है, यह जानना चाहिये ॥ यह इकत्तीसवाँ सूक्त और चौदहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥