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Rigveda / 2 / 33 / 5

हवी॑मभि॒र्हव॑ते॒ यो ह॒विर्भि॒रव॒ स्तोमे॑भी रु॒द्रं दि॑षीय। ऋ॒दू॒दरः॑ सु॒हवो॒ मा नो॑ अ॒स्यै ब॒भ्रुः सु॒शिप्रो॑ रीरधन्म॒नायै॑॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 33 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : रुद्रः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर वैद्य विषयको अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : हवी॑मऽभिः। हव॑ते। यः। ह॒विःऽभिः। अव॑। स्तोमे॑भिः। रु॒द्रम्। दि॒षी॒य॒। ऋ॒दू॒दरः॑। सु॒ऽहवः॑। मा। नः॒। अ॒स्यै। ब॒भ्रुः। सु॒ऽशिप्रः॑। री॒र॒ध॒त्। म॒नायै॑॥

पदार्थ : (यः) जो वैद्यजन (हवीमभिः) सुन्दर ओषधियों के देने से हम लोगों की (हवते) स्पर्द्धा करता है उस (रुद्रम्) वैद्य को मैं (हविर्भिः) ग्रहण करने योग्य (स्तोमेभिः) श्लाघाओं से (अव,दिषीय) न खण्डन करूँ अर्थात् न उसे क्लेश देऊँ जिससे (सुहवः) सुन्दरदानशील (दूदरः) कोमल उदरवाला (बभ्रुः) पालनकर्त्ता (सुशिप्रः) सुन्दर मुखयुक्त वैद्य (नः) हमारी (अस्यै) इस (मनायै) माननेवाली बुद्धि के लिये (मा,रीरधत्) मत हिंसा कर ॥५॥

भावार्थ : जो वैद्य जन रोगनिवारण से हमारी बुद्धि को बढ़ाते हैं, उनके साथ हम लोग कभी न विरोध करें ॥५॥