Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 2 / 33 / 11

स्तु॒हि श्रु॒तं ग॑र्त॒सदं॒ युवा॑नं मृ॒गं न भी॒ममु॑पह॒त्नुमु॒ग्रम्। मृ॒ळा ज॑रि॒त्रे रु॑द्र॒ स्तवा॑नो॒ऽन्यं ते॑ अ॒स्मन्नि व॑पन्तु॒ सेनाः॑॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 33 | Mantra No : 11

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : रुद्रः | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषयको अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : स्तु॒हि। श्रु॒तम्। ग॒र्त॒ऽसद॑म्। युवा॑नम्। मृ॒गम्। न। भी॒मम्। उ॒प॒ऽह॒त्नुम्। उ॒ग्रम्। मृ॒ळ। ज॒रि॒त्रे। रु॒द्र॒। स्तवा॑नः। अ॒न्यम्। ते॒। अ॒स्मत्। नि। व॒प॒न्तु॒। सेनाः॑॥

पदार्थ : हे (रुद्र) अन्यायकारियों को रुलानेवाले सेनापति ! आप (मृगम्) सिंह के (न) समान (भीमम्) भयंकर (श्रुतम्) जो सुने हैं उस (गर्त्तसदम्) घर में बैठकर (उपहत्नुम्) और समीप में मारते हुए (उग्रम्) क्रूर (युवानम्) पूर्ण बलवाले पुरुष की (स्तुहि) स्तुति कर और (जरित्रे) स्तुति करनेवाले के लिये (मृळ) सुखी कर (स्तवानः) स्तुति करता हुआ (अन्यम्) और धर्मात्मा की प्रशंसा कर जिससे विद्वान् (अस्मत्) मेरी उत्तेजना से (ते) तेरी (सेनाः) सेना अर्थात् बल को (नि,वपन्तु) विस्तारें ॥११॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो राज्य बढ़ाने की इच्छा करें, वे सिंह के समान शत्रुओं में भयंकर और श्रेष्ठों में आनन्द देनेवालों का राजकार्य्य और सेना में सत्कार कर और उनको आज्ञा दे न्याय से निरन्तर राज्य की पालना करे ॥११॥