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Rigveda / 2 / 33 / 15

ए॒वा ब॑भ्रो वृषभ चेकितान॒ यथा॑ देव॒ न हृ॑णी॒षे न हंसि॑। ह॒व॒न॒श्रुन्नो॑ रुद्रे॒ह बो॑धि बृ॒हद्व॑देम वि॒दथे॑ सु॒वीराः॑॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 33 | Mantra No : 15

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : रुद्रः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषयको अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : ए॒व। ब॒भ्रो॒ इति॑। वृ॒ष॒भ॒। चे॒कि॒ता॒न॒। यथा॑। दे॒व॒। न। हृ॒णी॒षे। न। हंसि॑। ह॒व॒न॒ऽश्रुत्। नः॒। रु॒द्र॒। इ॒ह। बो॒धि॒। बृ॒हत्। व॒दे॒म॒। वि॒दथे॑। सु॒ऽवीराः॑॥

पदार्थ : हे (बभ्रो) धारण वा पोषण करने वा (वृषभ) रोग निवारण करने से बल के देने वा (चेकितान) विज्ञान देने वा (देव) मनोहर (रुद्र) और सर्वरोग निवारनेवाले जिस कारण (हवनश्रुत्) देने लेने को सुननेवाले आप (इह) इसमें (यथा) जैसे (नः) हम लोगों के सुखों को (न) नहीं (हृणीषे) हरते हैं सबके सुखको (बोधि) जानें इससे हम लोग (सुवीराः) सुन्दर पराक्रम को प्राप्त होते हुए ही वैसे (चिदथे) ओषधियों के विज्ञानव्यवहार में (बृहत्) बहुत (वदेम) कहें ॥१५॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो वैद्य जन राज्य और न्याय के अधीश हों वे अन्याय से किसी का कुछ भी धन न हरें, न किसी को मारें किन्तु सदा अच्छे पथ्य और ओषधियों के व्यवहार सेवन से बल और पराक्रम को बढ़ावें ॥१५॥ इस सूक्त में वैद्य, राजपुरुष, और विद्या ग्रहण के व्यवहार वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति है, यह जानना चाहिये ॥ यह अठारहवाँ वर्ग और तैंतीसवाँ सूक्त समाप्त हुआ ॥