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Rigveda / 2 / 34 / 5

इन्ध॑न्वभिर्धे॒नुभी॑ र॒प्शदू॑धभिरध्व॒स्मभिः॑ प॒थिभि॑र्भ्राजदृष्टयः। आ हं॒सासो॒ न स्वस॑राणि गन्तन॒ मधो॒र्मदा॑य मरुतः समन्यवः॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 34 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : मरुतः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर विद्वानों के विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : इन्ध॑न्वऽभिः। धे॒नुऽभिः॑। र॒प्शदू॑धऽभिः। अ॒ध्व॒स्मऽभिः॑। प॒थिऽभिः॑। भ्रा॒ज॒त्ऽऋ॒ष्ट॒यः॒। आ। हं॒सासः॑। न। स्वस॑राणि। ग॒न्त॒न॒। मधोः॑। मदा॑य। म॒रु॒तः॒। स॒ऽम॒न्य॒वः॒॥

पदार्थ : हे (भ्राजदृष्टयः) प्रकाश को प्राप्त हुए (समन्यवः) क्रोधों के साथ वर्त्तमान (मरुतः) मरणधर्मा तुमलोग (इन्धन्वभिः) प्रदीप्त करनेवाली (धेनुभिः) वाणियों से वा (रप्शदूधभिः) प्रकट शब्दरूपी धनों से (अध्वभिः) जो कि ध्वस्त नष्ट न हुए उन (पथिभिः) मार्गों से (हंसासः) हंसों के (न) समान (मधोः) मधुर सम्बन्धी (मदाय) हर्ष के लिये (स्वसराणि) दिनों को (आ,गन्तन) आओ प्राप्त होओ ॥५॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे आकाशमार्ग से हंस अभीष्ट स्थानों को सुख से जाते हैं, वैसे सुशिक्षित वाणी से विद्यामार्गों को और धर्मपथों से सुखों को नित्य तुम लोग प्राप्त होओ ॥५॥