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Rigveda / 2 / 34 / 7

तं नो॑ दात मरुतो वा॒जिनं॒ रथ॑ आपा॒नं ब्रह्म॑ चि॒तय॑द्दि॒वेदि॑वे। इषं॑ स्तो॒तृभ्यो॑ वृ॒जने॑षु का॒रवे॑ स॒निं मे॒धामरि॑ष्टं दु॒ष्टरं॒ सहः॑॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 34 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : मरुतः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : तम्। नः॒। दा॒त॒। म॒रु॒तः॒। वा॒जिन॑म्। रथे॑। आ॒पा॒नम्। ब्रह्म॑। चि॒तय॑त्। दि॒वेऽदि॑वे। इष॑म्। स्तो॒तृऽभ्यः॑। वृ॒जने॑षु। का॒रवे॑। स॒निम्। मे॒धाम्। अरि॑ष्टम्। दु॒स्तर॑म्। सहः॑॥

पदार्थ : हे (मरुतः) प्राणवायु के समान प्रिय तुम (नः) हम लोगों के लिये (तम्) उस समस्त विद्या की स्तुति करनेवाले को (दात) देओ (रथे) रथ के निमित्त (वाजिनम्) सुशिक्षित घोड़े को देओ (दिवेदिवे) प्रतिदिन (चितवत्) चिताते हुए (आपानम्) व्यापक (ब्रह्म) धन वा अन्न को (वृजनेषु) बलों में (स्तोतृभ्यः) सकल विद्याओं के प्रयोजनवेत्ताओं के लिये (इयम्) इस प्रयोजन को (कारवे) करनेवाले के लिये (सनिम्) अलग-अलग बड़ी हुई (मेधाम्) उत्तम बुद्धि को और (अरिष्टम्) अविनष्ट (दुष्टरम्) दुःख से तैरने को योग्य (सहः) बल को देओ ॥७॥

भावार्थ : मनुष्यों को चाहिये कि सदैव सबके लिये सकल विद्या बतानेवाले से धर्म से संचित किया हुआ धन विद्वानों के देने के लिये अन्न उत्तम प्रज्ञा और पूर्ण बल को माँगें, विद्वान् जन निश्चय से याचकों के लिये उन उक्त पदार्थों को निरन्तर देवें ॥७॥