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Rigveda / 2 / 35 / 12

अ॒स्मै ब॑हू॒नाम॑व॒माय॒ सख्ये॑ य॒ज्ञैर्वि॑धेम॒ नम॑सा ह॒विर्भिः॑। सं सानु॒ मार्ज्मि॒ दिधि॑षामि॒ बिल्मै॒र्दधा॒म्यन्नैः॒ परि॑ वन्द ऋ॒ग्भिः॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 35 | Mantra No : 12

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : अपान्नपात् | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : अ॒स्मै। ब॒हू॒नाम्। अ॒व॒माय॑। सख्ये॑। य॒ज्ञैः। वि॒धे॒म॒। नम॑सा। ह॒विःऽभिः॑। सम्। सानु॑। मार्ज्मि॑। दिधि॑षामि। बिल्मैः॑। दधा॑मि। अन्नैः॑। परि॑। व॒न्दे॒। ऋ॒क्ऽभिः॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! हम लोग जैसे (अस्मै) इस (अवमाय) न्यून वा रक्षा करनेवाले (बहूनाम्) बहुत पदार्थों के बीच (सख्ये) मित्र के लिये (नमसा) अन्नादि पदार्थ (हविर्भिः) खाने वा देने योग्य पदार्थ और (यज्ञैः) मिली हुई क्रियाओं से उत्तम व्यवहार को (विधेम) प्राप्त हों वा उसकी सेवा करें वा जैसे मैं जिसके (सानु) अच्छे प्रकार सेवने योग्य पदार्थ को (सं,मार्ज्मि) अच्छा शुद्ध करूँ तथा (दिधिषामि) उपदेश करूँ वा (बिल्मैः) उत्तम दीप्ति को प्राप्त साधनों से युक्त (अन्नैः) अच्छा संस्कार किये हुए अन्नादि पदार्थों से (दधामि) धारण करता हूँ (ग्भिः) मन्त्रों से (परिवन्दे) सब ओर से स्तुति करता हूँ, उसकी तुम लोग भी सेवा करो ॥१२॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे मनुष्य बहुतों में से अपने मित्र को तृप्त करते हैं वा उसके लिये अन्नपानादि देते हैं, परस्पर हित का उपदेश करते हैं, वैसे सब भी इतनी विद्याओं को प्राप्त होकर औरों क प्रति उपदेश करें तथा ऐश्वर्य को होके औरों के लिये दें ॥१२॥