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Rigveda / 2 / 39 / 2

प्रा॒त॒र्यावा॑णा र॒थ्ये॑व वी॒राऽजेव॑ य॒मा वर॒मा स॑चेथे। मेने॑इव त॒न्वा॒३॒॑ शुम्भ॑माने॒ दम्प॑तीव क्रतु॒विदा॒ जने॑षु॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 39 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : अश्विनौ | छन्द : भुरिक्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : अब विद्वानों के विषय को कहते हैं।

पदपाठ : प्रा॒तः॒ऽयावा॑ना। र॒थ्या॑ऽइव। वी॒रा। अ॒जाऽइ॑व। य॒मा। वर॑म्। आ। स॒चे॒थे॒ इति॑। मेने॑इ॒वेति॒ मेने॑ऽइव। त॒न्वा॑। शुम्भ॑माने॒ इति॑। दम्प॑तीइ॒वेति॒ दम्प॑तीऽइव। क्र॒तु॒ऽविदा॑। जने॑षु॥

पदार्थ : जो सूर्य और पृथिवी (जनेषु) मनुष्यों में (रथ्येव) रथ के हित दो घोड़ों के तुल्य (प्रातर्यावाणा) जो प्रातःकाल जाते उनके समान वा (अजेव) दो बकरों के समान (वीरा) वीरता कर्मयुक्त वा (यमा) उपराम अर्थात् उड़ते-उड़ते निवृत्त हुए (मेने इव) दो मैनाओं के समान वा (तन्वा) शरीर से (शुम्भमाने) शोभते हुए (दम्पतीव) स्त्री-पुरुष के समान (क्रतुविदा) जिनसे प्रज्ञा को प्राप्त होते हैं उनको जान के पढ़ाने और पढ़नेवाले (वरम्) उत्तम कर्म का (आ,सचेथे) सम्बन्ध करते हैं ॥२॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को जैसे सुशिक्षित घोड़ेवाले एक यान में स्थिर होके बकरों के समान वीरता का प्रकाश कर पक्षियों वा स्त्री-पुरुषों के समान शोभा को प्राप्त होते और अच्छे कर्मों को उत्पन्न कराते हैं, वैसे सूर्य और भूमि सबका उपकार करनेवाले वर्त्तमान हैं, यह जानना चाहिये ॥२॥