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Rigveda / 2 / 40 / 2

इ॒मौ दे॒वौ जाय॑मानौ जुषन्ते॒मौ तमां॑सि गूहता॒मजु॑ष्टा। आ॒भ्यामिन्द्रः॑ प॒क्वमा॒मास्व॒न्तः सो॑मापू॒षभ्यां॑ जनदु॒स्रिया॑सु॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 40 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : सोमापूषणावदितिश्च | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब अग्नि के विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : इ॒मौ। दे॒वौ। जाय॑मानौ। जु॒ष॒न्त॒। इ॒मौ। तमां॑सि। गू॒ह॒ता॒म्। अजु॑ष्टा। आ॒भ्याम्। इन्द्रः॑। प॒क्वम्। आ॒मासु॑। अ॒न्तरिति॑। सो॒मापू॒षऽभ्या॑म्। ज॒न॒त्। उ॒स्रिया॑सु॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! सब पदार्थ (इमौ) इन प्रत्यक्ष (जायमानौ) उत्पन्न होते हुए (देवी) मनोहरों को (जुषन्त) सेवते हैं जो (इमौ) ये दोनों (अजुष्टा) न सेवन किये हुए (तमांसि) रात्रियों को (गूहताम्) अच्छे प्रकार ढाँपते हैं (आभ्याम्) इन (सोमापूषभ्याम्) चन्द्र और ओषधि गणों के साथ (इन्द्रः) बिजली वा सूर्य (आमासु) अपक्व (उस्रियासु) भूमियों के (अन्तः) बीच (पक्वम्) पके पदार्थ को (जनत्) उत्पन्न कराता उनका अच्छे प्रकार उपयोग करो ॥२॥

भावार्थ : जो अग्नि सबके भीतर स्थित प्रकाशकारक है, वह जिन चन्द्रमा और ओषधिगणों के बिना अकिंचित् कर होता अर्थात् संसार का सुख करनेवाला नहीं होता, उनको जान कार्य्यसिद्धि करनी चाहिये ॥२॥