Rigveda / 2 / 41 / 3
शु॒क्रस्या॒द्य गवा॑शिर॒ इन्द्र॑वायू नि॒युत्व॑तः। आ या॑तं॒ पिब॑तं नरा॥
Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 41 | Mantra No : 3
In English:
Seer : gRRitsamadaH shaunakaH | Devta : indravaayuu | Metre : gaayatrii | Tone : ShaDjaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : shukrasyaadya gavaashira indravaayuu niyutvataH. aa yaata.m pibata.m naraa.
Component Words : shukrasya. adya. go.aaashiraH. indravaayuu iti. niyutvataH. aa. yaatam. pibatam. naraa.
In Hindi:
ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : इन्द्रवायू | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय : अब अध्यापक और अध्येताओं के विषय को कहते हैं।
पदपाठ : शु॒क्रस्य॑। अ॒द्य। गोऽआ॑शिरः। इन्द्र॑वायू॒ इति॑। नि॒युत्व॑तः। आ। या॒त॒म्। पिब॑तम्। न॒रा॒॥
पदार्थ : हे (नरा) बिजली और पवन के समान वर्त्तमान अग्रगन्ता मनुष्यो ! तुम (अद्य) आज (शुक्रस्य) अज्ञानता सोखने और (गवाशिरः) किरण को अर्थात् विद्याओं को व्याप्त होनेवाले (नियुत्वतः) नियमयुक्त के समीप (आ,यातम्) आओ और जल रस (पिबतम्) पिओ ॥३॥
भावार्थ : जैसे बिजुली और पवन सर्वत्र अभिव्याप्त और सब जगत् की रक्षा करते हैं, वैसे उत्तम काम कर और शुद्ध जल पीके आरोग्यपन और सबकी उन्नति करनी चाहिये ॥३॥
In Sanskrit:
ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : इन्द्रवायू | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय : अथाऽध्यापकाऽध्येतृविषयमाह।
पदपाठ : शु॒क्रस्य॑। अ॒द्य। गोऽआ॑शिरः। इन्द्र॑वायू॒ इति॑। नि॒युत्व॑तः। आ। या॒त॒म्। पिब॑तम्। न॒रा॒॥
पदार्थ : (शुक्रस्य) शोषकस्योदकस्य। शुक्रमित्युदकना० निघं० १। १२। (अद्य) इदानीम् (गवाशिरः) गाः किरणान् अश्नुते तस्य (इन्द्रवायू) विद्युत्पवनौ (नियुत्वतः) नियमेन वर्त्तमानस्य (आ) (यातम्) प्राप्नुतम् (पिबतम्) (नरा) नायकौ ॥३॥
अन्वय : हे नरा इन्द्रवायू इव वर्त्तमानौ युवामद्य शुक्रस्य गवाशिरो नियुत्वत आयातं शुक्रस्योदकस्य रसं पिबतम् ॥३॥
भावार्थ : यथा विद्युत्पवनौ सर्वत्राऽभिव्याप्तौ सर्वं जगद्रक्षतस्तथोत्तमानि कर्माणि कृत्वा शुद्धोदकं पीत्वाऽरोग्यं सर्वेषामुन्नतिश्च कार्य्या ॥३॥