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Rigveda / 3 / 1 / 17

आ दे॒वाना॑मभवः के॒तुर॑ग्ने म॒न्द्रो विश्वा॑नि॒ काव्या॑नि वि॒द्वान्। प्रति॒ मर्ताँ॑ अवासयो॒ दमू॑ना॒ अनु॑ दे॒वान्र॑थि॒रो या॑सि॒ साध॑न्॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 1 | Mantra No : 17

In Hindi:

ऋषि : गाथिनो विश्वामित्रः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : आ। दे॒वाना॑म्। अ॒भ॒वः॒। के॒तुः। अ॒ग्ने॒। म॒न्द्रः। विश्वा॑नि। काव्या॑नि। वि॒द्वान्। प्रति॑। मर्ता॑न्। अ॒वा॒स॒यः॒। दमू॑नाः। अनु॑। दे॒वान्। र॒थि॒रः। या॒सि॒। साध॑न्॥

पदार्थ : हे (अग्ने) तीव्र बुद्धिजन (केतुः) ज्ञानवान् (मन्द्रः) आनन्द के देनेवाले आप (विश्वानि) समस्त (काव्यानि) कवियों से निर्म्माण किये हुए शास्त्रों को अध्ययन कर (देवानाम्) देवों के बीच (विद्वान्) ज्ञानवान् (आ, अभवः) हो तथा (दमूनाः) जितेन्द्रिय (रथिरः) और प्रशंसित रथवाले (साधन्) साधना करते हुए आप (मर्तान्) मनुष्य जो (देवान्) विद्वान् उनके (प्रति) प्रति (अवासयः) निवास कराओ वा (अनु, यासि) उक्त मनुष्यों के प्रति अनुकूलता से प्राप्त होते हैं ॥१७॥

भावार्थ : जो विद्वानों के बीच स्थित हो सब शास्त्रों का अध्ययन कर औरों को अध्ययन कराता है, वह सब सुखों को प्राप्त होता है ॥१७॥