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Rigveda / 3 / 3 / 8

वि॒श्पतिं॑ य॒ह्वमति॑थिं॒ नरः॒ सदा॑ य॒न्तारं॑ धी॒नामु॒शिजं॑ च वा॒घता॑म्। अ॒ध्व॒राणां॒ चेत॑नं जा॒तवे॑दसं॒ प्र शं॑सन्ति॒ नम॑सा जू॒तिभि॑र्वृ॒धे॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 3 | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : गाथिनो विश्वामित्रः | देवता : वैश्वानरोऽग्निः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर विद्वान् के विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : वि॒श्पति॑म्। य॒ह्वम्। अति॑थिम्। नरः॑। सदा॑। य॒न्तार॑म्। धी॒नाम्। उ॒शिज॑म्। च॒। वा॒घता॑म्। अ॒ध्व॒राणा॑म्। चेत॑नम्। जा॒तऽवे॑दस॑म्। प्र। शं॒स॒न्ति॒। नम॑सा। जू॒तिऽभिः॑। वृ॒धे॥

पदार्थ : जो (नरः) अपने आत्मा, इन्द्रियाँ और शरीरों को धर्म की ओर पहुँचानेवाले जन (वृधे) वृद्धि के लिये (जूतिभिः) वेगादि गुणों से (विश्पतिम्) समस्त प्रजा के पालनेवाले (यह्वम्) बड़े (यन्तारम्) नियन्ता अर्थात् सब कामों को यथानियम पहुँचानेवाले (अतिथिम्) अतिथि के समान सत्कार करने योग्य (धीनाम्) उत्तम कर्म और बुद्धियों वा (वाघताम्) बुद्धिमान् (च) और (अध्वराणाम्) अहिंसनीय व्यवहारों के बीच (उशिजम्) कामना की ओर (जातवेदसम्) उत्पन्न हुए सब पदार्थों में अपनी व्याप्ति से विद्यमान अथवा उत्पन्न हुए समस्त पदार्थों को जाननेवाले (चेतनम्) अच्छे प्रकार ज्ञानस्वरूप परमात्मा की (नमसा) सत्कार से (सदा) सदैव (प्र, शंसन्ति) प्रशंसा करते हैं, वे ब्रह्मवेत्ता होते हैं ॥८॥

भावार्थ : मनुष्यों को आप्त विद्वानों ने [=से] स्तुति किया हुआ महान् प्रजापालक ज्ञानस्वरूप परमेश्वर स्तुति करने योग्य है, इसकी उपासना के विना किसी को पूरा लाभ प्राप्त नहीं होता ॥८॥