Rigveda / 3 / 5 / 4
मि॒त्रो अ॒ग्निर्भ॑वति॒ यत्समि॑द्धो मि॒त्रो होता॒ वरु॑णो जा॒तवे॑दाः। मि॒त्रो अ॑ध्व॒र्युरि॑षि॒रो दमू॑ना मि॒त्रः सिन्धू॑नामु॒त पर्व॑तानाम्॥
Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 5 | Mantra No : 4
In English:
Seer : gaathino vishvaamitraH | Devta : agniH | Metre : triShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation Under Process
Verse : mitro agnirbhavati yatsamiddho mitro hotaa varuNo jaatavedaaH. mitro adhvaryuriShiro damuunaa mitraH sindhuunaamuta parvataanaam.
Component Words : mitraH. agniH. bhavati. yat. sam.aiddhaH. mitraH. hotaa. varuNaH. jaata.avedaaH. mitraH. adhvaryuH. iShiraH. damuunaaH. mitraH. sindhuunaam. uta. parvataanaam.
In Hindi:
ऋषि : गाथिनो विश्वामित्रः | देवता : अग्निः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।
पदपाठ : मि॒त्रः। अ॒ग्निः। भ॒व॒ति॒। यत्। सम्ऽइ॑द्धः। मि॒त्रः। होता॑। वरु॑णः। जा॒तऽवे॑दाः। मि॒त्रः। अ॒ध्व॒र्युः। इ॒षि॒रः। दमू॑नाः। मि॒त्रः। सिन्धू॑नाम्। उ॒त। पर्व॑तानाम्॥
पदार्थ : हे मनुष्यो ! (यत्) जो (सिन्धूनाम्) नदियों (उत) और (पर्वतानाम्) बड़ी शिलाओं के बीच (समिद्धः) प्रदीप्त (अग्निः) अग्नि के समान (मित्रः) मित्र वा (होता) ग्रहण करनेहारे के तुल्य (मित्रः) मित्र वा (जातवेदाः) उत्पन्न हुए पदार्थों के जाननेवाले जगदीश्वर के समान (वरुणः) श्रेष्ठ वा (अध्वर्य्युः) अपने को अहिंसा धर्म की इच्छा करनेवाले के समान (मित्रः) मित्र वा (इषिरः) इच्छा करनेवाले (दमूनाः) दमनशील के समान (मित्रः) मित्र (भवति) होता है उसका सत्कार करिये ॥४॥
भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य नदी, शैल और ओषधि आदिकों को किरणों के द्वारा पुष्ट करने वा उनको सुखानेवाला होता है, वैसे मित्र जन धर्म में पुष्टिकारक और अधर्म से निवर्तक होते हैं ॥४॥
In Sanskrit:
ऋषि : गाथिनो विश्वामित्रः | देवता : अग्निः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : पुनस्तमेव विषयमाह।
पदपाठ : मि॒त्रः। अ॒ग्निः। भ॒व॒ति॒। यत्। सम्ऽइ॑द्धः। मि॒त्रः। होता॑। वरु॑णः। जा॒तऽवे॑दाः। मि॒त्रः। अ॒ध्व॒र्युः। इ॒षि॒रः। दमू॑नाः। मि॒त्रः। सिन्धू॑नाम्। उ॒त। पर्व॑तानाम्॥
पदार्थ : (मित्रः) सुहृत् (अग्निः) पावकइव (भवति) (यत्) यः (समिद्धः) प्रदीप्तः (मित्रः) (होता) आदातेव (वरुणः) वरः (जातवेदाः) यथा जातानां सर्वेषां पदार्थानां वेत्ता जगदीश्वरः (मित्रः) (अध्वर्युः) आत्मनोऽध्वरमहिंसाधर्ममिच्छुः (इषिरः) इच्छुः (दमूनाः) दमनशीलः (मित्रः) (सिन्धूनाम्) नदीनाम् (उत) अपि (पर्वतानाम्) शैलानाम् ॥४॥
अन्वय : हे मनुष्या यद्यस्सिन्धूनामुत पर्वतानां समिद्धोऽग्निरिव मित्रो होतेव मित्रो जातवेदा इव वरुणोऽध्वर्य्युरिव मित्र इषिरो दमूना इव मित्रो भवति तं सत्कुरुत ॥४॥
भावार्थ : अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथा सूर्यो नदीशैलौषध्यादीनां किरणद्वारा पोषकः शोषको वा भवति तथा सखायो धर्मे पोषका अधर्मे शोषका अर्थात् धर्मे प्रवर्त्तका अधर्मान् निवर्त्तका भवन्ति ॥४॥