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Rigveda / 3 / 6 / 3

द्यौश्च॑ त्वा पृथि॒वी य॒ज्ञिया॑सो॒ नि होता॑रं सादयन्ते॒ दमा॑य। यदी॒ विशो॒ मानु॑षीर्देव॒यन्तीः॒ प्रय॑स्वती॒रीळ॑ते शु॒क्रम॒र्चिः॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 6 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : गाथिनो विश्वामित्रः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : द्यौः। च॒। त्वा॒। पृ॒थि॒वी। य॒ज्ञिया॑सः। नि। होता॑रम्। सा॒द॒य॒न्ते॒। दमा॑य। यदि॑। विशः॑। मानु॑षीः। दे॒व॒ऽयन्तीः॑। प्रय॑स्वतीः। ईळ॑ते। शु॒क्रम्। अ॒र्चिः॥

पदार्थ : हे राजन् ! (यदि) जो (प्रयस्वतीः) बहुत प्रकार का जिनमें तर्प्पण तृप्ति विद्यमान वे (देवयन्तीः) विद्वानों की कामना करनेवाली (मानुषीः) मनुष्यसम्बन्धी (विशः) प्रजा जिन (त्वा) आप (शुक्रम्) आपके पराक्रम और (अर्चिः) विद्या के प्रकाश की (ईडते) स्तुति करती हैं उन (होतारम्) दानशील आपको (दमाय) जितेन्द्रियत्व के लिये (यज्ञियासः) यज्ञ की सिद्धि करनेवाले (नि सादयन्ते) निरन्तर स्थापन करते हैं (द्यौः) प्रकाश (च) और (पृथिवीः) पृथिवी भी प्राप्त होती हैं ॥३॥

भावार्थ : जब राजा और राजपुरुष विद्या विनय और नीतियों से अपनी प्रजाओं को प्रसन्न करते और जितेन्द्रिय होकर दुष्ट व्यसनों से रहित होते हैं, वे धर्म, अर्थ, काम और मोक्षों को प्राप्त होते हैं। यहाँ वीर्य और विद्या की उन्नति को उत्तम कारण जानो ॥३॥