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Rigveda / 3 / 7 / 7

अ॒ध्व॒र्युभिः॑ प॒ञ्चभिः॑ स॒प्त विप्राः॑ प्रि॒यं र॑क्षन्ते॒ निहि॑तं प॒दं वेः। प्राञ्चो॑ मदन्त्यु॒क्षणो॑ अजु॒र्या दे॒वा दे॒वाना॒मनु॒ हि व्र॒ता गुः॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 7 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : गाथिनो विश्वामित्रः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब उपदेशक लोग किसके सदृश क्या करते हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : अ॒ध्व॒र्युऽभिः॑। प॒ञ्चऽभिः॑। स॒प्त। विप्राः॑। प्रि॒यम्। र॒क्ष॒न्ते॒। निऽहि॑तम्। प॒दम्। वेः। प्राञ्चः॑। म॒द॒न्ति॒। उ॒क्षणः॑। अ॒जु॒र्याः। दे॒वाः। दे॒वाना॑म्। अनु॑। हि। व्र॒ता। गुरिति॒ गुः॥

पदार्थ : जो (प्राञ्चः) प्रकृष्ट विद्यायुक्त (उक्षणः) सुख फैलानेहारे (अजुर्य्याः) शरीर आत्मा की जीर्ण अवस्था से रहित (देवाः) विद्वान् लोग (हि) ही (देवानाम्) विद्वानों के (व्रता) सत्यभाषणादि उत्तम स्वभावों को (अनु, गुः) अनुकूलतापूर्वक प्राप्त हों वे (अध्वर्य्युभिः) यज्ञ रचनेवाले (पञ्चभिः) होता, अध्वर्यु, उद्गाता, ब्रह्मा और सभ्य इन पाँच ऋत्विजों और पत्नी यजमानों के साथ वर्त्तमान (सप्त) सात (विप्राः) बुद्धिमान् लोग (वेः) व्यापक परमेश्वर के (प्रियम्) प्रिय (निहितम्) स्थित (पदम्) प्राप्त करने योग्य स्वरूप की (रक्षन्ते) रक्षा करते हैं वे ही (मदन्ति) आनन्दित होते हैं ॥७॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! जैसे सात ऋत्विज लोग यज्ञ करके प्रजाओं को सुखी करते हैं, वैसे ही उपदेशक विद्वान् लोग सुशील धार्मिक हो के अध्यापन और उपदेश से सब मनुष्यों को आनन्दित करते हैं ॥७॥