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Rigveda / 3 / 8 / 3

उच्छ्र॑यस्व वनस्पते॒ वर्ष्म॑न्पृथि॒व्या अधि॑। सुमि॑ती मी॒यमा॑नो॒ वर्चो॑ धा य॒ज्ञवा॑हसे॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 8 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : गाथिनो विश्वामित्रः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : स्वराडनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : उत्। श्र॒य॒स्व॒। व॒न॒स्प॒ते॒। वर्ष्म॑न्। पृ॒थि॒व्याः। अधि॑। सुऽमि॑ती। मी॒यमा॑नः। वर्चः॑। धाः॒। य॒ज्ञऽवा॑हसे॥

पदार्थ : हे (वर्ष्मन्) श्रेष्ठ गुणों के प्रचारक (वनस्पते) सेवने योग्य धन के रक्षक विद्वान् ! आप (पृथिव्याः) भूमि के (अधि) ऊपर खम्भ के तुल्य (उत्, श्रयस्व) ऊँचे हूजिये (मीयमानः) सत्कार किये हुए (सुमती) सुन्दर बुद्धि से (यज्ञवाहसे) पढ़ने-पढ़ाने आदि यज्ञ के प्राप्त करानेहारे विद्यार्थी के लिये (वर्चः) पढ़ने रूप तेज को (धाः) धारण कीजिये ॥३॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे वट आदि वनस्पति जड़, स्कन्ध, डाली आदि से बढ़ते हैं, वैसे ही पुरुषार्थ के साथ विद्याओं का प्रचार कर मनुष्यों को बढ़ाना चाहिये ॥३॥