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Rigveda / 3 / 8 / 6

यान्वो॒ नरो॑ देव॒यन्तो॑ निमि॒म्युर्वन॑स्पते॒ स्वधि॑तिर्वा त॒तक्ष॑। ते दे॒वासः॒ स्वर॑वस्तस्थि॒वांसः॑ प्र॒जाव॑द॒स्मे दि॑धिषन्तु॒ रत्न॑म्॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 8 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : गाथिनो विश्वामित्रः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : मनुष्यों को किनका ग्रहण वा त्याग करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : यान्। वः॒। नरः॑। दे॒व॒ऽयन्तः॑। नि॒ऽमि॒म्युः। वन॑स्पते। स्वऽधि॑तिः। वा॒। त॒तक्ष॑। ते। दे॒वासः॑। स्वर॑वः। त॒स्थि॒ऽवांसः॑। प्र॒जाऽव॑त्। अ॒स्मे इति॑। दि॒धि॒ष॒न्तु॒। रत्न॑म्॥

पदार्थ : हे (नरः) नायक लोगो ! (यान्, वः) जिन तुमको (देवयन्तः) कामना करते हुए जन (निमिम्युः) निरन्तर मान करें (ते) वे (स्वरवः) अपने विद्याबोधक शब्दों से युक्त (तस्थिवांसः) स्थिर बुद्धिवाले (देवासः) आप विद्वान् लोग (अस्मे) हमारे (प्रजावत्) प्रजावान् (रत्नम्) धन का (दिधिषन्तु) उपदेश करें। (वा) अथवा हे (वनस्पते) वनों के रक्षक पुरुष ! जैसे (स्वधितिः) वज्र मेघ को (ततक्ष) काटता है वैसे आप दुष्टता को काटो ॥६॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जिनके सङ्ग से अन्य जन सभ्य विद्वान् हों, उन्हीं का सङ्ग तुम लोग भी करो। जिनके समागम से दुर्व्यसन बढ़े, उनको सब लोग त्याग देवें ॥६॥