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Rigveda / 3 / 9 / 3

अति॑ तृ॒ष्टं व॑वक्षि॒थाथै॒व सु॒मना॑ असि। प्रप्रा॒न्ये यन्ति॒ पर्य॒न्य आ॑सते॒ येषां॑ स॒ख्ये असि॑ श्रि॒तः॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 9 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : गाथिनो विश्वामित्रः | देवता : अग्निः | छन्द : विराड्बृहती | स्वर : मध्यमः

विषय : अब कौन मनुष्य जगत् में पूज्य होते हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : अति॑। तृ॒ष्टम्। व॒व॒क्षि॒थ॒। अथ॑। ए॒व। सु॒ऽमनाः॑। अ॒सि॒। प्रऽप्र॑। अ॒न्ये। यन्ति॑। परि॑। अ॒न्ये। आ॒स॒ते॒। येषा॑म्। स॒ख्ये। असि॑। श्रि॒तः॥

पदार्थ : हे विद्वान् जन ! जिस कारण आप (तृष्टम्) प्यासे को (ववक्षिथ) प्राप्त करना चाहते (अथ) अथवा (सुमनाः) प्रसन्नचित्त (एव) ही (असि) हैं तथा (येषाम्) जिनकी (सख्ये) मित्रता वा मित्र कर्म में आप (श्रितः) संयुक्त (असि) हैं उनमें से (अन्ये) अन्य लोग (प्रप्र, अति, यन्ति) विशेष कर अत्यन्त प्राप्त होते तथा (अन्ये) अन्य लोग (परि, आसते) सब ओर से बैठते हैं ॥३॥

भावार्थ : जो लोग मित्रभाव से प्यासे के लिये जल के तुल्य विद्या चाहनेवाले के अर्थ विद्या देकर प्रसन्नरूप करते हैं, वे ही जगत् में पूज्य होते हैं ॥३॥