Rigveda / 3 / 9 / 7
तद्भ॒द्रं तव॑ दं॒सना॒ पाका॑य चिच्छदयति। त्वां यद॑ग्ने प॒शवः॑ स॒मास॑ते॒ समि॑द्धमपिशर्व॒रे॥
Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 9 | Mantra No : 7
In English:
Seer : gaathino vishvaamitraH | Devta : agniH | Metre : nichRRidbRRihatii | Tone : madhyamaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : tadbhadra.m tava da.msanaa paakaaya chichChadayati. tvaa.m yadagne pashavaH samaasate samiddhamapisharvare.
Component Words : tat. bhadram. tava. da.msanaa. paakaaya. chit. Chadayati. tvaam. yat. agne. pashavaH. sam.aaasate. sam.aiddham. api.asharvare.
In Hindi:
ऋषि : गाथिनो विश्वामित्रः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृद्बृहती | स्वर : मध्यमः
विषय : फिर मनुष्य कैसे सब भय से रहित होते हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।
पदपाठ : तत्। भ॒द्रम्। तव॑। दं॒सना॑। पाका॑य। चि॒त्। छ॒द॒य॒ति॒। त्वाम्। यत्। अ॒ग्ने॒। प॒शवः॑। स॒म्ऽआस॑ते। सम्ऽइ॑द्धम्। अ॒पि॒ऽश॒र्व॒रे॥
पदार्थ : हे (अग्ने) अग्नि के तुल्य तेजस्वि ! (यत्) जो मनुष्य (अपिशर्वरे) निश्चित अन्धकाररूप रात्रि में भी (समिद्धम्) प्रज्वलित अग्नि के निकट जैसे (पशवः) गौ आदि पशु शीतनिवारणार्थ वैसे (त्वाम्) आपके निकट (समासते) बैठते हैं उनके (पाकाय) परिपक्व दृढ़ होने के लिये अग्नि के (चित्) तुल्य (तत्) उस (भद्रम्) कल्याणकारक बुद्धि से उत्पन्न ज्ञान को (तव) आपका (दंसना) दर्शन शास्त्र (छदयति) बढ़ाता है ॥७॥
भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जैसे वन में अग्नि के चारों ओर स्थित हुए पशु सिंह आदि से रक्षित होते हैं, वैसे ही विद्वानों के ज्ञान का आश्रय मनुष्यों की सब ओर के भय से रक्षा करता है ॥७॥
In Sanskrit:
ऋषि : गाथिनो विश्वामित्रः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृद्बृहती | स्वर : मध्यमः
विषय : पुनर्मनुष्याः कथं सर्वभयाद्रहिता भवन्तीत्याह।
पदपाठ : तत्। भ॒द्रम्। तव॑। दं॒सना॑। पाका॑य। चि॒त्। छ॒द॒य॒ति॒। त्वाम्। यत्। अ॒ग्ने॒। प॒शवः॑। स॒म्ऽआस॑ते। सम्ऽइ॑द्धम्। अ॒पि॒ऽश॒र्व॒रे॥
पदार्थ : (तत्) प्रज्ञाजन्यं ज्ञानम् (भद्रम्) भन्दनीयम् कल्याणकारम् (तव) (दंसना) दंसनं दर्शनम्। अत्र विभक्तेराकारादेशः। (पाकाय) परिपक्वत्वाय (चित्) इव (छदयति) सत्करोति। छदयतीत्यर्चतिकर्मा। निघं० ३।१४। (त्वाम्) (यत्) यतः (अग्ने) अग्निरिव प्रकाशात्मन् (पशवः) गवादयः (समासते) सम्यगुपविशन्ति (समिद्धम्) प्रदीप्तम् (अपिशर्वरे) निश्चिते रात्रावन्धकारे ॥७॥
अन्वय : हे अग्ने ! यद्ये मनुष्या अपिशर्वरे समिद्धमग्निं पशवइव त्वां समासते तेषां पाकायाग्निश्चिदिव तद्भद्रं तव दंसना छदयति ॥७॥
भावार्थ : अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। हे मनुष्या यथाऽरण्येऽग्नेरभितः स्थिताः पशवः सिंहादिभ्यो रक्षिता भवन्ति तथैव विद्वज्ज्ञानाश्रयो मनुष्यान् सर्वतो भयात् रक्षति ॥७॥