Rigveda / 3 / 10 / 5
प्र होत्रे॑ पू॒र्व्यं वचो॒ऽग्नये॑ भरता बृ॒हत्। वि॒पां ज्योतीं॑षि॒ बिभ्र॑ते॒ न वे॒धसे॑॥
Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 10 | Mantra No : 5
In English:
Seer : gaathino vishvaamitraH | Devta : agniH | Metre : viraaDuShNik | Tone : RRIShabhaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : pra hotre puurvya.m vacho.agnaye bharataa bRRihat. vipaa.m jyotii.mShi bibhrate na vedhase.
Component Words : pra. hotre. puurvyam. vachaH. agnaye. bharata. bRRihat. vipaam. jyotii.mShi. bibhrate. na. vedhase.
In Hindi:
ऋषि : गाथिनो विश्वामित्रः | देवता : अग्निः | छन्द : विराडुष्णिक् | स्वर : ऋषभः
विषय : अब अध्यापक और विद्वान् के कर्तव्य को कहते हैं।
पदपाठ : प्र। होत्रे॑। पू॒र्व्यम्। वचः॑। अ॒ग्नये॑। भ॒र॒त॒। बृ॒हत्। वि॒पाम्। ज्योतीं॑षि। बिभ्र॑ते। न। वे॒धसे॑॥
पदार्थ : हे विद्वज्जनो ! (होत्रे) ग्रहण करनेवाले (अग्नये) अग्नि के (न) समान (विपाम्) उत्तम बुद्धिवालों के (ज्योतींषि) विद्यारूप तेजों को (बिभ्रते) धारण करते हुए (वेधसे) बुद्धिमान् के लिये (बृहत्) महत् प्रयोजनवाले (पूर्व्यम्) प्राचीन विद्वानों से उपदेश किये हुए (वचः) वचन को (प्र, भरत) उपदेश कीजिये ॥५॥
भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे यज्ञ करनेवाले यज्ञ के लिये घृत आदि पदार्थों से उत्तम प्रकार पूर्वक पकाये हुए अन्नों से अग्नि की वृद्धि करते हैं, वैसे ही अध्यापक पुरुष अङ्ग और उपाङ्गों के सहित सम्पूर्ण विद्याओं के प्रचार से विद्यार्थी और श्रोतृजनों को तृप्त करें ॥५॥
In Sanskrit:
ऋषि : गाथिनो विश्वामित्रः | देवता : अग्निः | छन्द : विराडुष्णिक् | स्वर : ऋषभः
विषय : अथाध्यापकविद्वत्कृत्यमाह।
पदपाठ : प्र। होत्रे॑। पू॒र्व्यम्। वचः॑। अ॒ग्नये॑। भ॒र॒त॒। बृ॒हत्। वि॒पाम्। ज्योतीं॑षि। बिभ्र॑ते। न। वे॒धसे॑॥
पदार्थ : (प्र) (होत्रे) आदात्रे (पूर्व्यम्) पूर्वैर्विद्वद्भिरुपदिष्टम् (वचः) वचनम् (अग्नये) पावकाय (भरत) धरत। अत्र संहितायामिति दीर्घः। (बृहत्) महदर्थयुक्तम् (विपाम्) मेधाविनाम्। अत्र वाच्छन्दसीति नुडभावः। (ज्योतींषि) विद्यातेजांसि (बिभ्रते) धर्त्रे (न) इव (वेधसे) मेधाविने ॥५॥
अन्वय : हे विद्वांसो होत्रेऽग्नये विपां ज्योतींषि न बिभ्रते वेधसे बृहत्पूर्व्यं वचः प्रभरत ॥५॥
भावार्थ : अत्रोपमालङ्कारः। यथा याजका यज्ञाय घृतादीन् पदार्थान् गृहीत्वा सुसंस्कृतान्नैरग्निं वर्द्धर्यन्ति तथैवाध्यापकाः साङ्गोपाङ्गाः सर्वा विद्या धृत्वा विद्यार्थिनः श्रोतॄँश्च तर्प्पयेयुः ॥५॥