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Rigveda / 3 / 11 / 3

अ॒ग्निर्धि॒या स चे॑तति के॒तुर्य॒ज्ञस्य॑ पू॒र्व्यः। अर्थं॒ ह्य॑स्य त॒रणि॑॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 11 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : गाथिनो विश्वामित्रः | देवता : अग्निः | छन्द : विराड्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : मनुष्यों को किनका सेवन करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : अ॒ग्निः। धि॒या। सः। चे॒त॒ति॒। के॒तुः। य॒ज्ञस्य॑। पू॒र्व्यः। अर्थ॑म्। हि। अ॒स्य॒। त॒रणि॑॥

पदार्थ : जो विद्वान् पुरुष (अग्निः) अग्नि के सदृश तेजस्वी (केतुः) उपदेश द्वारा बुद्धि का प्रकाश करने तथा (तरणि) सद्विद्या से दुःख का छुड़ानेवाला (पूर्व्यः) प्राचीन विद्वानों में चतुर (धिया) कर्म से वा बुद्धि से (हि) जिस कारण से (अस्य) इस (यज्ञस्य) विद्वानों के सत्काररूप व्यवहार को (अर्थम्) प्रयोजन को (चेतति) उत्तम प्रकार जानता वा अन्यों को जनाता है, इससे (सः) वह सेवा करने योग्य है ॥३॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जो पुरुष विद्यारूप यज्ञ को उत्तम प्रकार से जानते हैं, उन्हीं पुरुषों की विद्या की उन्नति होने के लिये सेवा करो ॥३॥