Rigveda / 3 / 14 / 4
मि॒त्रश्च॒ तुभ्यं॒ वरु॑णः सह॒स्वोऽग्ने॒ विश्वे॑ म॒रुतः॑ सु॒म्नम॑र्चन्। यच्छो॒चिषा॑ सहसस्पुत्र॒ तिष्ठा॑ अ॒भि क्षि॒तीः प्र॒थय॒न्त्सूर्यो॒ नॄन्॥
Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 14 | Mantra No : 4
In English:
Seer : RRiShabho vaishvaamitraH | Devta : agniH | Metre : viraaTtriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation Under Process
Verse : mitrashcha tubhya.m varuNaH sahasvo.agne vishve marutaH sumnamarchan. yachChochiShaa sahasasputra tiShThaa abhi kShitiiH prathayantsuuryo nRRIn.
Component Words : mitraH. cha. tubhyam. varuNaH. sahasvaH. agne. vishve. marutaH. sumnam. archan. yat. shochiShaa. sahasaH. putra. tiShThaaH. abhi. kShitiiH. prathayan. suuryaH. nRRIn.
In Hindi:
ऋषि : ऋषभो वैश्वामित्रः | देवता : अग्निः | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : फिर मनुष्य क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।
पदपाठ : मि॒त्रः। च॒। तुभ्य॑म्। वरु॑णः। स॒ह॒स्वः॒। अग्ने॑। विश्वे॑। म॒रुतः॑। सु॒म्नम्। अ॒र्च॒न्। यत्। शो॒चिषा॑। स॒ह॒सः॒। पु॒त्र॒। तिष्ठाः॑। अ॒भि। क्षि॒तीः। प्र॒थय॑न्। सूर्यः॑। नॄन्॥
पदार्थ : हे (सहस्वः) अत्यन्त बलधारी (अग्ने) अग्नि के सदृश प्रतापयुक्त जन ! (तुभ्यम्) आपके लिये जो (वरुणः) श्रेष्ठ (मित्रः) प्रेमी (च) और व्यवहारज्ञाता आदर करते हैं तो उनका आप भी आदर करें। हे (सहसः) बल के (पुत्र) पुत्र के सदृश तेज से विद्यमान (यत्) जिसकारण (शोचिषा) प्रकाश से (सूर्य्यः) सूर्य्य के तुल्य आप जिन (क्षितीः) मनुष्यों वा (नॄन्) मुख्य पुरुषों को (प्रथयन्) प्रकट करते हुए (अभि) सन्मुख, (तिष्ठाः) उपस्थित होइये जिससे आपको (विश्वे) सम्पूर्ण (मरुतः) मनुष्य (सुम्नम्) सुखपूर्वक (अर्चन्) स्तवन करें ॥४॥
भावार्थ : जो मनुष्य अग्नि आदि पदार्थों से विद्या द्वारा उपकार ग्रहण करें, तो वे परस्पर मित्रों के तुल्य सुखभोग करें ॥४॥
In Sanskrit:
ऋषि : ऋषभो वैश्वामित्रः | देवता : अग्निः | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : पुनर्मनुष्याः किं कुर्य्युरित्याह।
पदपाठ : मि॒त्रः। च॒। तुभ्य॑म्। वरु॑णः। स॒ह॒स्वः॒। अग्ने॑। विश्वे॑। म॒रुतः॑। सु॒म्नम्। अ॒र्च॒न्। यत्। शो॒चिषा॑। स॒ह॒सः॒। पु॒त्र॒। तिष्ठाः॑। अ॒भि। क्षि॒तीः। प्र॒थय॑न्। सूर्यः॑। नॄन्॥
पदार्थ : (मित्रः) सखा (च) व्यवहारवित् (तुभ्यं) (वरुणः) श्रेष्ठः (सहस्वः) बहुबलयुक्त (अग्ने) अग्निरिव प्रतापवन् (विश्वे) सर्वे (मरुतः) मनुष्याः (सुम्नम्) (अर्चन्) प्राप्नुवन्तु (यत्) यतः (शोचिषा) प्रकाशेन (सहसः) बलाय (पुत्र) पुत्रवद्वर्त्तमान (तिष्ठाः) तिष्ठेः (अभि) आभिमुख्ये (क्षितीः) मनुष्यान् (प्रथयन्) प्रकटीकुर्वन् (सूर्य्यः) सवितेव (नॄन्) नायकान् ॥४॥
अन्वय : हे सहस्वोऽग्ने तुभ्यं यौ मित्रौ वरुणश्चार्चतस्तौ त्वमर्च। हे सहसस्पुत्र यद्यतः शोचिषा सूर्य्य इव त्वं यान् क्षितीर्नॄन् प्रथयन् सन्नभितिष्ठास्तस्मात्त्वं विश्वे मरुतः सुम्नमर्चन् ॥४॥
भावार्थ : यदि मनुष्या अग्न्यादिपदार्थेभ्यो विद्ययोपकारान् गृह्णीयुस्तर्ह्येते मित्रवत्सुखानि विस्तारयेयुः ॥४॥