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Rigveda / 3 / 15 / 3

त्वं नृ॒चक्षा॑ वृष॒भानु॑ पू॒र्वीः कृ॒ष्णास्व॑ग्ने अरु॒षो वि भा॑हि। वसो॒ नेषि॑ च॒ पर्षि॒ चात्यंहः॑ कृ॒धी नो॑ रा॒य उ॒शिजो॑ यविष्ठ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 15 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : उत्कीलः कात्यः | देवता : अग्निः | छन्द : भुरिक्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : त्वम्। नृ॒ऽचक्षाः॑। वृ॒ष॒भ॒। अनु॑। पू॒र्वीः। कृ॒ष्णासु॑। अ॒ग्ने॒। अ॒रु॒षः। वि। भा॒हि॒। वसो॒ इति॑। नेषि॑। च॒। पर्षि॑। च॒। अति॑। अंहः॑। कृ॒धि। नः॒। रा॒ये। उ॒शिजः॑। य॒वि॒ष्ठ॒॥

पदार्थ : हे (यविष्ठ) अत्यन्त युवा (वृषभ) वीरतायुक्त (अग्ने) अग्नि के सदृश विद्या से प्रकाशमान ! (त्वम्) आप सूर्य्य के सदृश (अरुषः) रक्षक और (नृचक्षाः) मनुष्यों के सत् असत् कर्म में विवेकी होकर (कृष्णासु) अविद्यान्धकारयुक्त नीच प्रजाओं में (अनु) (पूर्वीः) प्रथम ईश्वर से प्रकट की गई प्रजाओं को (वि) (भाहि) प्रकाशमान कीजिये। हे (वसो) उत्तम गुणधारी ! जिससे आप (राये) धन के लिये (उशिजः) कामनाविशिष्ट पुरुषों के योग्य (नेषि) प्राप्त कराते (च) मनोरथों को पूर्ण (च) और (पर्षि) दुःखों से रहित तथा (अंहः) बुरे आचरण को (अति) दूर कीजिये, इससे आप (नः) हम लोगों को श्रेष्ठ (कृधि) कीजिये ॥३॥

भावार्थ : हे विद्वान् पुरुषो ! आप लोगों को चाहिये कि जैसे सूर्य्य अपने किरणों के द्वारा सब जनों का पालन करता है, वैसे विद्या और उत्तम शिक्षा से संपूर्ण प्रजा को विद्या धन से युक्त तथा पाप से निवृत्त करके पुण्य कर्मों में प्रीतिपूर्वक प्रवृत्त करावें ॥३॥