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Rigveda / 3 / 18 / 3

इ॒ध्मेना॑ग्न इ॒च्छमा॑नो घृ॒तेन॑ जु॒होमि॑ ह॒व्यं तर॑से॒ बला॑य। याव॒दीशे॒ ब्रह्म॑णा॒ वन्द॑मान इ॒मां धियं॑ शत॒सेया॑य दे॒वीम्॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 18 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : कतो वैश्वामित्रः | देवता : अग्निः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : इ॒ध्मेन॑। अ॒ग्ने॒। इ॒च्छमा॑नः। घृ॒तेन॑। जु॒होमि॑। ह॒व्यम्। तर॑से। बला॑य। याव॑त्। ईशे॑। ब्रह्म॑णा। वन्द॑मानः। इ॒माम्। धिय॑म्। श॒त॒ऽसेया॑य। दे॒वीम्॥

पदार्थ : हे (अग्ने) अग्नि के सदृश प्रकाशित विद्यायुक्त ! जैसे (इध्मेन) समिध से तथा (घृतेन) उत्तम प्रकार के मन्त्रों से संस्कारयुक्त घृत से (इच्छमानः) इच्छाकारी मैं (तरसे) वेग तथा (बलाय) बल के लिये (हव्यम्) हवनसामग्री का (जुहोमि) होम करता हूँ (ब्रह्मणा) अतिशय धन के साथ (वन्दमानः) स्तुति से उपासनाकारक मैं (शतसेयाय) शत आदि संख्या से पूरित धनप्राप्ति के लिये (इमाम्) विद्यमान इस (देवीम्) प्रकाशमान (धियम्) धारणायोग्य बुद्धि की (यावत्) जितने परिमाण से (ईशे) इच्छाकारक हूँ, उसी प्रकार आप हवन कीजिये, उतनी इच्छा करो ॥३॥

भावार्थ : जैसे इन्धन और घृत से अग्नि बढ़ती है, वैसे ही ब्रह्मचर्य्य तथा वेद के अभ्यास से बल और विद्या बढ़ती है। जितना वेद से ब्रह्मचर्य्य रखना योग्य है, उतना अभ्यास करना चाहिये ॥३॥