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Rigveda / 3 / 19 / 5

यत्त्वा॒ होता॑रम॒नज॑न्मि॒येधे॑ निषा॒दय॑न्तो य॒जथा॑य दे॒वाः। स त्वं नो॑ अग्नेऽवि॒तेह बो॒ध्यधि॒ श्रवां॑सि धेहि नस्त॒नूषु॑॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 19 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : गाथी कौशिकः | देवता : अग्निः | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : यत्। त्वा॒। होता॑रम्। अ॒नज॑न्। मि॒येधे॑। नि॒ऽषा॒दय॑न्तः। य॒जथा॑य। दे॒वाः। सः। त्वम्। नः॒। अ॒ग्ने॒। अ॒वि॒ता। इ॒ह। बो॒धि॒। अधि॑। श्रवां॑सि। धे॒हि॒। नः॒। त॒नूषु॑॥

पदार्थ : हे (अग्ने) विद्वान् पुरुष ! (निषादयन्तः) अत्यन्त अधिकार में स्थित कराने वा जनानेवाले (देवाः) विद्वान् पुरुष (मियेधे) प्राप्त होने योग्य यज्ञ में (यजथाय) विद्या में बोध कराने के लिये (यत्) जिन (होतारम्) विद्यादाता (त्वा) आपकी (अनजन्) कामना करें (सः) वह (त्वम्) आप (इह) इस संसार में (नः) हम लोगों की (अविता) रक्षा आदि के कर्ता हुए हम लोगों को (बोधि) बोध कराइये और (नः) हम लोगों के (तनूषु) शरीरों में (श्रवांसि) प्रिय अन्नों के सदृश सम्पदाओं को (अधि) उत्तम प्रकार (धेहि) स्थित करो ॥५॥

भावार्थ : हे विद्वान् मनुष्यो ! जिन अधिकारों में आप लोग नियुक्त किये जायें, उन अधिकारों में उत्तम प्रकार वर्त्तमान होके सर्व जनों को श्रेष्ठ बनाइये और जिस शिक्षा से विद्या सभ्यता आरोग्यता और अवस्था बढ़े, ऐसा उपाय निरन्तर करो ॥५॥ इस सूक्त में अग्नि और विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये ॥ यह उन्नीसवाँ सूक्त और उन्नीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥