Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 3 / 26 / 6

व्रातं॑व्रातं ग॒णंग॑णं सुश॒स्तिभि॑र॒ग्नेर्भामं॑ म॒रुता॒मोज॑ ईमहे। पृष॑दश्वासो अनव॒भ्ररा॑धसो॒ गन्ता॑रो य॒ज्ञं वि॒दथे॑षु॒ धीराः॑॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 26 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा | देवता : मरूतः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : व्रात॑म्ऽव्रातम्। ग॒णम्ऽग॑णम्। सु॒श॒स्तिऽभिः॑। अ॒ग्नेः। भाम॑म्। म॒रुता॑म्। ओजः॑। ई॒म॒हे॒। पृष॑त्ऽअश्वासः। अ॒न॒व॒भ्रऽरा॑धसः। गन्ता॑रः। य॒ज्ञम्। वि॒दथे॑षु। धीराः॑॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! (पृषदश्वासः) सेचनकर्त्ता और वेग आदि गुणयुक्त (अनवभ्रराधसः) अविनाशी धनों के दाता (गन्तारः) प्राप्त होनेवाले पवनों के तुल्य (सुशस्तिभिः) सुन्दर स्तुतियों के साथ वर्त्तमान (धीराः) ध्यानवाले विद्वान् पुरुष (विदथेषु) विज्ञान आदिकों में (यज्ञम्) मेल करने और (अग्नेः) अग्नि से उत्पन्न (भामम्) तेज को (मरुताम्) पवनों के समीप से (ओजः) बल और अन्य पदार्थों के (व्रातंव्रातम्) वर्त्तमान वर्त्तमान (गणंगणम्) समूह समूह की याचना करते हैं, वैसे ही हम लोग इस सबकी (ईमहे) याचना करते हैं ॥६॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य अग्नि वायु आदि पदार्थों से कार्य्यों के समूह को साधते हैं, वे विद्वान् कहाते हैं ॥६॥