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Rigveda / 3 / 27 / 11

अ॒ग्निं य॒न्तुर॑म॒प्तुर॑मृ॒तस्य॒ योगे॑ व॒नुषः॑। विप्रा॒ वाजैः॒ समि॑न्धते॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 27 | Mantra No : 11

In Hindi:

ऋषि : विश्वामित्रः | देवता : अग्निः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : अ॒ग्निम्। य॒न्तुर॑म्। अ॒प्ऽतुर॑म्। ऋ॒तस्य॑। योगे॑। व॒नुषः॑। विप्राः॑। वाजैः॑। सम्। इ॒न्ध॒ते॒॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जैसे (वनुषः) याचना करनेवाले (विप्राः) बुद्धिमान् जन (ऋतस्य) सत्य के (योगे) योग में (वाजैः) विज्ञान आदिकों से (यन्तुरम्) प्राप्तिकारक (अप्तुरम्) प्राण वा जलों की प्रेरणाकर्त्ता (अग्निम्) अग्नि के सदृश तेजस्वी को (सम्) (इन्धते) उत्तम प्रकार प्रदीप्त करें, वैसे ही सम्पूर्ण जनों से विद्या प्रकाश करने योग्य है ॥११॥

भावार्थ : जिस समय विद्वान् पुरुषों का सङ्ग होवे, उस समय उत्तम विज्ञान ही की प्रश्न-उत्तरों से याचना करनी चाहिये, इससे अधिक लाभ और न समझना चाहिये ॥११॥