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Rigveda / 3 / 29 / 10

अ॒यं ते॒ योनि॑र्ऋ॒त्वियो॒ यतो॑ जा॒तो अरो॑चथाः। तं जा॒नन्न॑ग्न॒ आ सी॒दाथा॑ नो वर्धया॒ गिरः॑॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 29 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा | देवता : अग्निः | छन्द : भुरिगनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : अ॒यम्। ते॒। योनिः॑। ऋ॒त्वियः॑। यतः॑। जा॒तः। अरो॑चथाः। तम्। जा॒नन्। अ॒ग्ने॒। आ। सी॒द॒। अथ॑। नः॒। व॒र्ध॒य॒। गिरः॑॥

पदार्थ : हे (अग्ने) अग्नि के सदृश तेजस्वी विद्वान् पुरुष ! जो (ते) आप का (अयम्) यह अग्नि आदि पदार्थ विद्या के ज्ञान का आधार (ऋत्वियः) समयों के योग्य (योनिः) सुख का घर है (यतः) जहाँ से (जातः) प्रकट हुआ (अरोचथाः) प्रकाशित हो (तम्) उसको (जानन्) जानते हुए यहाँ (आ) (सीद) स्थिर होइये और (अथ) इसके अनन्तर (नः) हम लोगों की (गिरः) विद्या और उत्तम शिक्षायुक्त वाणियों की (वर्धय) उन्नति कीजिये ॥१०॥

भावार्थ : मनुष्यों को उचित है कि जिस-जिस कर्म से शरीर आत्मा और ऐश्वर्य्यों की वृद्धि हो, वह-वह कर्म सब काल में करें ॥१०॥