Rigveda / 3 / 30 / 3
इन्द्रः॑ सु॒शिप्रो॑ म॒घवा॒ तरु॑त्रो म॒हाव्रा॑तस्तुविकू॒र्मिर्ऋघा॑वान्। यदु॒ग्रो धा बा॑धि॒तो मर्त्ये॑षु॒ क्व१॒॑त्या ते॑ वृषभ वी॒र्या॑णि॥
Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 30 | Mantra No : 3
In English:
Seer : gopavana aatreyaH saptavadhrirvaa | Devta : indra: | Metre : bhurikpa~Nkti | Tone : pa~nchamaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : indraH sushipro maghavaa tarutro mahaavraatastuvikuurmirRRighaavaan. yadugro dhaa baadhito martyeShu kva1tyaa te vRRiShabha viiryaaNi.
Component Words : indraH. su.ashipraH. magha.avaa. tarutraH. mahaa.avraataH. tuvi.akuurmiH. RRIghaavaan. yat. ugraH. dhaaH. baadhitaH. martyeShu. kva. tyaa. te. vRRiShabha. viiryaaNi.
In Hindi:
ऋषि : गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा | देवता : इन्द्र: | छन्द : भुरिक्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः
विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।
पदपाठ : इन्द्रः॑। सु॒ऽशिप्रः॑। म॒घऽवा॑। तरु॑त्रः। म॒हाऽव्रा॑तः। तु॒वि॒ऽकू॒र्मिः। ऋघा॑वान्। यत्। उ॒ग्रः। धाः। बा॒धि॒तः। मर्त्ये॑षु। क्व॑। त्या। ते॒। वृ॒ष॒भ॒। वी॒र्या॑णि॥
पदार्थ : हे (वृषभ) बलिष्ठ ! (मर्त्येषु) मनुष्यों में (बाधितः) पीड़ित (उग्रः) तेजस्वी स्वभाव से युक्त (यत्) जो दुःख दूर करनेवाले हैं उन को (धाः) धारण करो (ते) आपके (त्या) वे (वीर्य्याणि) वीर पुरुषों में हुए योग्य बल (क्व) किसमें हैं इस प्रकार (सुशिप्रः) सुन्दर ठोढ़ी और नासिकायुक्त (मघवा) अत्यन्त श्रेष्ठ धन से युक्त (तरुत्रः) दुःखों से छुड़ानेवाला (महाव्रातः) सत्य आदि व्रतों में श्रद्धालु पुरुषों का मित्र (तुविकूर्मिः) बहुत प्रकार के कर्मों के आरम्भ में उत्साही (ऋघावान्) शत्रुओं के नाशकर्त्ता बहुत से शूरवीरों के सहित वर्त्तमान (इन्द्रः) अत्यन्त ऐश्वर्य्य से युक्त आप होवें ॥३॥
भावार्थ : जब मनुष्य के अनेक प्रकार की पीड़ायें प्रकट हों, तब बहुत से उपायों को युक्त करें, इस प्रकार पुरुषार्थ से विघ्नों को दूर करके शोभा और बल निरन्तर बढ़ाने योग्य हैं ॥३॥
In Sanskrit:
ऋषि : गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा | देवता : इन्द्र: | छन्द : भुरिक्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः
विषय : पुनस्तमेव विषयमाह।
पदपाठ : इन्द्रः॑। सु॒ऽशिप्रः॑। म॒घऽवा॑। तरु॑त्रः। म॒हाऽव्रा॑तः। तु॒वि॒ऽकू॒र्मिः। ऋघा॑वान्। यत्। उ॒ग्रः। धाः। बा॒धि॒तः। मर्त्ये॑षु। क्व॑। त्या। ते॒। वृ॒ष॒भ॒। वी॒र्या॑णि॥
पदार्थ : (इन्द्रः) परमैश्वर्य्ययुक्तः (सुशिप्रः) शोभनहनुनासिकः (मघवा) परमपूजितधनयुक्तः (तरुत्रः) दुःखेभ्यस्तारकः (महाव्रातः) महान्तो व्राताः व्रतेषु कुशला जनाः सखायो यस्य सः (तुविकूर्मिः) तुविर्बहुविधः कूर्मिः कर्मयोगो यस्य सः (ऋघावान्) य ॠन् शत्रून् घ्नन्ति ते वा बहवः शूरा विद्यन्ते यस्य। अत्र हनधातोर्वर्णव्यत्ययेन हस्य घो नलोपश्च। (यत्) यानि (उग्रः) तेजस्विस्वभावः (धाः) धेहि (बाधितः) विलोडितः (मर्त्येषु) (क्व) कस्मिन् (त्या) तानि (ते) तव (वृषभ) बलिष्ठ (वीर्याणि) वीरेषु साधूनि बलानि ॥३॥
अन्वय : हे वृषभ मर्त्येषु बाधितः उग्रः सन् यद्यानि दुःखनिवारणानि धास्ते तव त्या वीर्याणि क्व सन्ति। एवं सुशिप्रो मघवा तरुत्रो महाव्रातस्तुविकूर्मिर्ऋघावानिन्द्रस्त्वं भवेः ॥३॥
भावार्थ : यदा मनुष्यस्यानेकविधा बाधाः समुत्थिताः स्युस्तदाऽनेकानुपायान्युञ्जीत। एवं पुरुषार्थेन विघ्नानि निवार्य श्रीबले सततं वर्धनीये ॥३॥