Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 3 / 32 / 9

अद्रो॑घ स॒त्यं तव॒ तन्म॑हि॒त्वं स॒द्यो यज्जा॒तो अपि॑बो ह॒ सोम॑म्। न द्याव॑ इन्द्र त॒वस॑स्त॒ ओजो॒ नाहा॒ न मासाः॑ श॒रदो॑ वरन्त॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 32 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा | देवता : इन्द्र: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

पदपाठ : अद्रो॑घ। स॒त्यम्। तव॑। तत्। म॒हि॒ऽत्वम्। स॒द्यः। यत्। जा॒तः। अपि॑बः। ह॒। सोम॑म्। न। द्यावः॑। इ॒न्द्र॒। त॒वसः॑। ते॒। ओजः॑। न। अहा॑। न। मासाः॑। श॒रदः॑। व॒र॒न्त॒॥

पदार्थ : हे (अद्रोघ) द्रोह से रहित (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य्य के दाता जगदीश्वर ! (यत्) जो (सद्यः) तत्काल (जातः) प्रकट हुआ सूर्य (सोमम्) सब जगत् से रस को (अपिबः) पीता-खींचता है (तत्) वह जिन (तव) आपके (सत्यम्) सत्य (महित्वम्) महिमा को (न) नहीं उल्लङ्घन कर सकता है (ते) आपके (तवसः) बल के (ओजः) प्रभाव को न (द्यावः) प्रकाशस्वरूप लोक (न) न (अहा) दिन (न) न (मासाः) चैत्र आदि महीने और न (शरदः) वसन्त आदि ऋतुयें (वरन्त) धारण करती हैं (भवन्तं, ह) उन्हीं आपकी हम लोग निरन्तर सेवा करें ॥९॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! जैसे परमेश्वर किसी से द्रोह नहीं करता है, वैसे आप लोग भी हूजिये। जिस परमेश्वर की सृष्टि में सूर्य्य आदि बड़े-बड़े पदार्थ विद्यमान हैं और जिसके स्वरूप वा प्रभाव के अन्त को कोई भी नहीं प्राप्त होता है, वही हम लोगों का इष्टदेव है ॥९॥