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Rigveda / 3 / 33 / 7

प्र॒वाच्यं॑ शश्व॒धा वी॒र्यं१॒॑ तदिन्द्र॑स्य॒ कर्म॒ यदहिं॑ विवृ॒श्चत्। वि वज्रे॑ण परि॒षदो॑ जघा॒नाय॒न्नापोऽय॑नमि॒च्छमा॑नाः॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 33 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा | देवता : नद्यः | छन्द : पङ्क्तिः | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर मनुष्य क्या करे, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

पदपाठ : प्र॒ऽवाच्य॑म्। श॒श्व॒धा। वी॒र्य॑म्। तत्। इन्द्र॑स्य। कर्म॑। यत्। अहि॑म्। वि॒ऽवृ॒श्चत्। वि। वज्रे॑ण। प॒रि॒ऽषदः॑। ज॒घा॒न॒। आय॑न्। आपः॑। अय॑नम्। इ॒च्छमा॑नाः॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जो सूर्य्य (अहिम्) मेघ को (विवृश्चत्) काटता है (यत्) जो (इन्द्रस्य) सूर्य्य का (वीर्य्यम्) बलरूप (कर्म) कर्म है (तत्) वह (शश्वधा) निरन्तर हो (प्रवाच्यम्) कहने योग्य और जैसे (वज्रेण) किरण से विदीर्ण किये गये मेघ के (आपः) जल (अयनम्) भूमि स्थान को (आयन्) प्राप्त होवैं मेघ को (विजघान) नाश करता है वैसे ही (इच्छमानाः) इच्छा करते हुए जन (परिषदः) जिनमें बैठें, उन सभा को करैं ॥७॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जो धर्मसम्बन्धी काम करके दुष्ट पुरुषों के निवारण के लिये अपना पराक्रम दिखावे, उसके उस कर्म की प्रशंसा सब काल में करनी चाहिये। जो लोग सभा में श्रेष्ठ होवें, वे न्याय से सब लोगों की उन्नति करने की इच्छा करें ॥७॥