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Rigveda / 3 / 35 / 3

उपो॑ नयस्व॒ वृष॑णा तपु॒ष्पोतेम॑व॒ त्वं वृ॑षभ स्वधावः। ग्रसे॑ता॒मश्वा॒ वि मु॑चे॒ह शोणा॑ दि॒वेदि॑वे स॒दृशी॑रद्धि धा॒नाः॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 35 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

पदपाठ : उपो॒ इति॑। न॒य॒स्व॒। वृष॑णा। त॒पुः॒ऽपा। उ॒त। ई॒म्। अ॒व॒। त्वम्। वृ॒ष॒भ॒। स्व॒धा॒ऽवः॒। ग्रसे॑ताम्। अश्वा॑। वि। मु॒च॒। इ॒ह। शोणा॑। दि॒वेऽदि॑वे। स॒ऽदृशीः॑। अ॒द्धि॒। धा॒नाः॥

पदार्थ : हे (वृषभ) बलवान् (स्वधावः) अत्यन्त अन्नयुक्त (त्वम्) आप (इह) इस वाहन में जो (तपुष्पा) तपते हुए पदार्थों को रखनेवाले (वृषणा) बल और (शोणा) लालरङ्गयुक्त (अश्वा) शीघ्रगामी अग्नि आदि इन्धनों को (ग्रसेताम्) भक्षण करै उनमें कलाओं को (वि, मुच) छोड़ो (ईम्) जल को (उपो) उनके समीप में (नयस्व) पहुँचाओ (उत) और (दिवेदिवे) नित्य (सदृशीः) तुल्य परिणामवाले (धानाः) अग्नि से संस्कार किये अन्न विशेषों को (अद्धि) भक्षण करो, उनमें बोझों को (अव) पेश करो ॥३॥

भावार्थ : जो शिल्पी जन अग्नि जल आदि पदार्थों को उत्तम कलाओं से युक्त वाहनों में संयुक्त करके चलाते हैं, वे दारिद्र्य को छोड़ के धन और धान्य को प्राप्त होते हैं ॥३॥