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Rigveda / 3 / 35 / 7

स्ती॒र्णं ते॑ ब॒र्हिः सु॒त इ॑न्द्र॒ सोमः॑ कृ॒ता धा॒ना अत्त॑वे ते॒ हरि॑भ्याम्। तदो॑कसे पुरु॒शाका॑य॒ वृष्णे॑ म॒रुत्व॑ते॒ तुभ्यं॑ रा॒ता ह॒वींषि॑॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 35 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा | देवता : इन्द्र: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

पदपाठ : स्ती॒र्णम्। ते॒। ब॒र्हिः। सु॒तः। इ॒न्द्र॒। सोमः॑। कृ॒ताः। धा॒नाः। अत्त॑वे। ते॒। हरि॑ऽभ्याम्। तत्ऽओ॑कसे। पु॒रु॒ऽशाका॑य। वृष्णे॑। म॒रुत्व॑ते। तुभ्य॑म्। रा॒ता। ह॒वींषि॑॥

पदार्थ : हे (इन्द्र) दरिद्रता के नाश करनेवाले ! (ते) आपका (स्तीर्णम्) ढंपा और (बर्हिः) बढ़ा हुआ जल वा (सुतः) उत्पन्न किया गया (सोमः) ऐश्वर्य्य का संयोग वा (कृताः) सिद्ध किये गये (धानाः) पके हुए अन्न विशेष वा (हरिभ्याम्) घोड़ों से संयुक्त वाहन पर बैठे हुए जो (ते) आपके जन और (तदोकसे) वाहनरूप स्थानवाले (पुरुशाकाय) अनेक प्रकार की शक्ति से (वृष्णे) वृष्टि करानेवाले (मरुत्वते) कार्य्य करानेवाले बहुत मनुष्यों के सहित विराजमान (तुभ्यम्) आपके लिये (अत्तवे) भोजन करने को जो (हवींषि) भोजन करने के योग्य अन्न आदि (राता) वर्त्तमान उनको भोगो ॥७॥

भावार्थ : सम्पूर्ण जन उत्तम पदार्थों के भोजन करनेवाले हों और अन्याय से इकट्ठे किये हुए किसी भी पदार्थ का भोग न करैं, इस प्रकार वर्त्ताव करने पर धनसामर्थ्य, विद्या और आयु बढ़ते हैं ॥७॥