Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 3 / 36 / 6

प्र यत्सिन्ध॑वः प्रस॒वं यथाय॒न्नापः॑ समु॒द्रं र॒थ्ये॑व जग्मुः। अत॑श्चि॒दिन्द्रः॒ सद॑सो॒ वरी॑या॒न्यदीं॒ सोमः॑ पृ॒णति॑ दु॒ग्धो अं॒शुः॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 36 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब विद्वान् के गुणों को अगले मन्त्र में कहते हैं।

पदपाठ : प्र। यत्। सिन्ध॑वः। प्र॒ऽस॒वम्। यथा॑। आय॑न्। आपः॑। स॒मु॒द्रम्। र॒थ्या॑ऽइव। ज॒ग्मुः॒। अतः॑। चि॒त्। इन्द्रः॑। सद॑सः। वरी॑यान्। यत्। ई॒म्। सोमः॑। पृ॒णति॑। दु॒ग्धः। अं॒शुः॥

पदार्थ : (यथा) जैसे (सिन्धवः) नदियाँ (प्रसवम्) मेघ को वा (आपः) जल (समुद्रम्) अन्तरिक्ष को (आयन्) प्राप्त होते हैं जैसे (यत्) जो उत्तम गुणों को प्राप्त होवैं वा (रथ्येव) रथों में जो उत्तम चाल उसके सदृश सब स्थानों में (प्र, जग्मुः) प्राप्त हुए उनके साथ (चित्) भी (यत्) जो (इन्द्रः) राजा (वरीयान्) श्रेष्ठ पुरुष होता हुआ (सदसः) सभाओं को प्राप्त होवैं (अतः) इससे वह (दुग्धः) गुणों से पूर्ण (अंशुः) ओषधियों का सार भाग और (सोमः) ओषधियों का समूह (ईम्) जल को जैसे प्राप्त हो वैसे सम्पूर्ण प्राणियों को (पृणति) सुख देता है ॥६॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमा और वाचक लुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य वैर को त्याग के सम्पूर्ण प्राणियों के उपकार करने की इच्छा करैं, उनके प्रति जैसे नदियाँ समुद्र को और जल अन्तरिक्ष के सन्मुख को प्राप्त होते हैं, वैसे सन्मुख जाते हैं, उनसे उत्तम शिक्षा को प्राप्त उत्तम प्रकार से सींचे गये ओषधियों के समूह के सदृश सम्पूर्ण प्राणियों के सुख देने को समर्थ होते हैं ॥६॥