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Rigveda / 3 / 42 / 3

इन्द्र॑मि॒त्था गिरो॒ ममाच्छा॑गुरिषि॒ता इ॒तः। आ॒वृते॒ सोम॑पीतये॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 42 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अब विद्वानों के सत्कार विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

पदपाठ : इन्द्र॑म्। इ॒त्था। गिरः॑। मम॑। अच्छ॑। अ॒गुः॒। इ॒षि॒ताः। इ॒तः। आ॒ऽवृते॑। सोम॑ऽपीतये॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जैसे (आवृते) सब ओर से ढाँपे हुए स्थान विशेष में (सोमपीतये) सोमलता के रस के पान करने के लिये (मम) मेरी (इषिताः) प्रेरणा की गईं (गिरः) उत्तम प्रकार शिक्षित वाणियाँ (इतः) इससे (इन्द्रम्) अत्यन्त ऐश्वर्य्यवाले को (अच्छ, अगुः) अच्छे प्रकार प्राप्त हों (इत्था) इस प्रकार से आप लोगों की भी वाणियाँ इसको प्राप्त हों ॥३॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। विद्वान् लोग अन्य जनों के प्रति इस प्रकार से उपदेश देवें कि हम लोग जिनका बुला कर सत्कार करें, आप लोग भी उन्हीं का सत्कार करें ॥३॥